मूकनायक/ देश
“राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा”
सरेआम लूट और डकैती इसी को कहते हैं। सरकारी संस्थानों की बदहाली और भ्रष्टाचार का मामला है ¹ ² ³ ⁴। देशहित में एकबार सोचो जरूर, क्या हम दोबारा गुलामी के अंधे कुएं में सुनियोजित षडयंत्रों से धकेले तो नहीं जा रहे हैं?
देश की सारी संपदाओं को कुछ चुनिंदा लोगों के हवाले करके हमें गुलाम बनाया जा रहा है। सबसे पहले लापरवाही करके संस्थानों को बदनाम कराया जाता है, फिर बेचने की तैयारी। चुनाव में मदद करने वालों को सरकारी बैंकों से पैसे देकर खरीदवाया जाता है, फिर कुछ वर्षों बाद लोन माफ चुपचाप कर दिया जाता है। हिस्सा चुनावी चंदे के रूप में मिल जाता है ¹ ² ³ ⁴।
लेकिन जो युवा पहले गर्व से सम्मान के साथ सरकारी नौकरियाँ करते थे, उनकी नौकरियाँ छीन जाती हैं। और वे सेठों के कनपकड़े चेलों की तरह पालतू बना दिए जाते हैं। संविदाकर्मियों के रूप में काम करते हैं, कभी परमानेंट उनकी नौकरी नहीं होती ¹ ² ³ ⁴।
चोरों को दोबारा जीताया है आपने तो अब आपके हकों पर डकैतियों को पढ़ने से कोई रोक नहीं सकता। लुटता हुआ देखते रहो, अपने भारतीय संस्थाओं को, जोकि देशवासियों की 70 वर्षों की कड़ी मेहनत + टेक्स के पैसों से स्थापित हुई थी ¹ ² ³ ⁴।
लेकिन पिछली बार का चोर अब डकैत बन चुका है, सरेआम बेचेगा। आप आँख बंद करके नारे लगाते रहो, मीडिया के अफवाहबाजों संग बर्बादियों का जश्न मनाते रहो, कुछ कदम और बढाते रहे हो गुलामी की और।
- लेखक:::आशाराम मीणा, उप प्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक, कोटा, राजस्थान।
यह लेखक के निजी विचार हैं।

