Thursday, February 26, 2026
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महात्मा ज्योतिबा फुले

मूकनायक /देश

*राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा*

महान समाज सुधारक और शिक्षा के अग्रदूत समाज सुधारक और सच्चे देश भक्त ज्योतिबा फुले के चरणों में उनकी पुण्यतिथि पर हमारा कोटि कोटि प्रणाम

ज्योतिबा फुले ने हमारे देश और समाज की तरक्की के लिए रास्तें खोले हैं, ना केवल उन्होंने समाज सुधारक की भूमिका निभाई बल्कि एक शिक्षा सुधारक की भूमिका भी निभाई है । उन्होंने अपनी धर्मपत्नी सावत्री बाई फुले के साथ मिलकर महिलाओं की स्थिति सुधारने और उनके लिए शिक्षा के नए मार्ग खोलने का काम भी बेखूबी निभाया । उन्होंने खुद जुल्म सहे, पर अपना रास्ता नहीं बदला। वो महिलाओं की उस समय की दयनीय हालत देख कर उन्हे बहुत तकलीफ होती थी । इसलिए ज्योतिबा जी स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाना चाहते थे। ओर हमारे देश और समाज को भी एक नया मोड़ देना चाहते थे।

ज्योतिबा फुले जन्म:

ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल1827 में खानवाड़ी पुणे में हुआ था। उनकी माता जी का नाम चिमनाबाई ओर पिता का नाम गोविन्दराव था। उनका परिवार कई पीढ़ी से माली का काम करता था।ज्योतिबा के दादा शेरिबा गोरेहे माधवराव पेशवा के महल के डिजाइनर थे। इनकी धर्मपत्नी का नाम सावित्री बाई फुले था। इनके मुख्य विचार नीतिशास्त्र मानवतावाद और समाज सुधारक थे।

ज्योतिबा फुले का मूल उद्देश्य था महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने का और उनको शिक्षा का अधिकार प्रधान करना , बाल विवाह रोकना, बहु विवाह रोकना और विधवा विवाह का समर्थन करना था । फुले समाज की कुप्रथा, अंधविश्वास और पाखंड को जड़ से मिटाना चाहते थे। वो अपना संपूर्ण जीवन स्त्रियों को शिक्षा देने , उनके हक और अधिकारों के प्रति जागरूक करना चाहते थे। वो स्त्री और पुरुष के भेदभाव को मिटाना चाहते थे। इसी मकसद से उन्होंने कन्याओं के लिए भारत देश की पहली पाठशाला पुणे में स्थापित की। वो महिलाओं की दयनीय स्थिति को देखकर बहुत दुखी और व्याकुल होते थे इसीलिए उन्होंने दृढ़ निश्चय लिया कि वो समाज में महिलाओं के क्रांतिकारी बदलाव लाकर ही रहेंगे और उनके इस काम में उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले ने बेखूबी साथ दिया।

ज्योतिबा फुले के इस काम की सराहना करते हुए डॉ आंबेडकर ने भी उन्हें अपना गुरु माना हैं।इस तरह से महिलाओं और शूद्रों के लिए नए रास्ते खोलने वाले राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले के महापरिनिर्वाण दिवस 28 नवंबर (1890) पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

लेखक: नीलम अंबेडकर सामाजिक चिंतक, जिला ब्यूरो चीफ मूकनायक, सोनीपत

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