मूकनायक
देश
“राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा”
भारत का संविधान अनुच्छेद 51 – अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि – भाग IV – राज्य के नीति निर्देशक तत्व (36 – 51)
51.राज्य,–
(क) अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का,
(ख) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का,
(ग) संगठित लोगों के एक दूसरे से व्यवहारों में अंतरराष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का, और
(घ) अंतरराष्ट्रीय विवादों के माध्य स्थम् द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का,
प्रयास करेगा।
भारत का संविधान अनुच्छेद 350 – व्यथा के निवारण के लिए अभ्यावेदन में प्रयोग की जाने वाली भाषा – भाग XVII – राजभाषा (343 – 351)
350.प्रत्येक व्यक्ति किसी व्यथा के निवारण के लिए संघ या राज्य के किसी अधिकारी या प्राधिकारी को, यथास्थिति, संघ में या राज्य में प्रयोग होने वाली किसी भाषा में अभ्यावेदन देने का हकदार होगा।
भारत का संविधान – अनुच्छेद – 51 क : मूल कर्तव्य – भाग – 4क, मूल कर्तव्य 51A;
भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह–
(क) संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे;
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नागरिकता अधिनियम 1955, धारा 10 खंड 2 ख के द्वारा नागरिकता से वंचित किया जाना, उस नागरिक ने अपने आप को कार्य या वाणी द्वारा या विधि द्वारा यथा स्थापित भारत का संविधान के प्रति अभक्त (Non devotee) या अप्रीतिपूर्ण (Unpleasant) दर्शित किया है।
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राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971, खण्ड 2.भारत का संविधान का(मौखिक या लिखित या कृत्यों द्वारा) अपमान करता है तो उसे तीन वर्ष तक का कारावास या जुर्माने से,या दोनों से दंडित किया जाएगा ।
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भारतीय न्याय संहिता 2023- अध्याय 11 – लोक प्रशांति के विरुद्ध अपराधों के विषय में-197. राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन, प्राख्यान
- (1) जो किसी बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या इलेक्ट्रॉनिक संसूचना के माध्यम से या अन्यथा,-
(क) ऐसा कोई लांछन लगाएगा या प्रकाशित करेगा कि किसी वर्ग के व्यक्ति इस कारण से कि वे किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं, विधि द्वारा स्थापित भारत का संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा नहीं रख सकते या भारत की प्रभुता और अखंडता की मर्यादा नहीं बनाए रख सकते; अथवा
(ख) यह प्राख्यान करेगा, परामर्श देगा, सलाह देगा, प्रचार करेगा या प्रकाशित करेगा कि किसी वर्ग के व्यक्तियों को इस कारण से कि वे किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं, भारत के नागरिक के रूप में उनके अधिकार न दिए जाएं या उन्हें उनसे वंचित किया जाए ; या
(ग) किसी वर्ग के व्यक्तियों की, बाध्यता के संबंध में इस कारण कि वे किसी धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं, कोई प्राख्यान करता है, परामर्श देता है, अभिवाक् करता है या अपील करता है या प्रकाशित करता है, और ऐसे प्राख्यान, परामर्श, अभिवाक् या अपील से ऐसे सदस्यों तथा अन्य व्यक्तियों के बीच असामंजस्य, अथवा शत्रुता या घृणा या वैमनस्य की भावनाएं उत्पन्न होती हैं या उत्पन्न होनी संभाव्य हैं ; अथवा
(घ) भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता या सुरक्षा को खतरे में डालने वाली मिथ्या या भ्रामक जानकारी देता है या प्रकाशित करता है, वह कारावास से, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा ।
(2) जो कोई, उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट कोई अपराध, किसी उपासना स्थल में या धार्मिक उपासना या धार्मिक कर्म करने में लगे हुए किसी जमाव में करेगा, वह कारावास से, जो पांच वर्ष तक का हो सकेगा, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
भारत का संविधान, अनुच्छेद 1 : भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ होगा।
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भारत का संविधान, अनुच्छेद – 393 : इस संविधान का संक्षिप्त नाम भारत का संविधान है।
साधारण खण्ड अधिनियम 1897 संशोधन 1950 साधारण परिभाषाएं खण्ड 3. परिभाषाएं-उपखंड (15) “संविधान ” से “भारत का संविधान” अभिप्रेत होगा ;
भारत का संविधान – अनुच्छेद 53 – संघ की कार्यपालिका शक्ति – भाग 5 – संघ (52 – 151)
53.(1) संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी और वह इसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा।
(2) पूर्वगामी उपबंध की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, संघ के रक्षा बलों का सर्वोच्च समादेश राष्ट्रपति में निहित होगा और उसका प्रयोग विधि द्वारा विनियमित होगा।
(3) इस अनुच्छेद की कोई बात–
(क) किसी विद्यमान विधि द्वारा किसी राज्य की सरकार या अन्य प्राधिकारी को प्रदान किए गए कृत्य राष्ट्रपति को अंतरित करने वाली नहीं समझी जाएगी; या
(ख) राष्ट्रपति से भिन्न अन्य प्राधिकारियों को विधि द्वारा कृत्य प्रदान करने से संसद को निवारित नहीं करेगी।
भारत का संविधान – अनुच्छेद 60 – राष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान – भाग 5 – संघ (52 – 151)
प्रत्येक राष्ट्रपति और प्रत्येक व्यक्ति, जो राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहा है या उसके कृत्यों का निर्वहन कर रहा है, अपना पद ग्रहण करने से पहले भारत के मुख्य न्यायमूर्ति या उसकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय के उपलब्ध ज्येष्ठतम न्यायाधीश के समक्ष निम्नलिखित प्ररूप में शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा, अर्थात्: —
ईश्वर की शपथ लेता हूँ
“मैं, अमुक —————–कि मैं श्रद्धापूर्वक भारत के राष्ट्रपति के पद का कार्यपालन सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ। अथवा राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करूंगा तथा अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करूँगा और मैं भारत की जनता की सेवा और कल्याण में निरत रहूँगा ।
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भारत का संविधान – अनुच्छेद 61 – राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया – भाग 5 – संघ (52 – 151)
(1) जब संविधान के ओंतक्रमण के लिए राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाना हो, तब संसद का कोई सदन आरोप लगाएगा।
(2) ऐसा कोई आरोप तब तक नहीं लगाया जाएगा जब तक कि—
(क) ऐसा आरोप लगाने की प्रस्थापना किसी ऐसे संकल्प में अंतर्विष्ट नहीं है, जो कम से कम चौदह दिन की ऐसी लिखित सूचना के दिए जाने के पश्चात् प्रस्तावित किया गया है जिस पर उस सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम एक-चौथाई सदस्यों ने हस्ताक्षर करके उस संकल्प को प्रस्तावित करने का अपना आशय प्रकट किया है; और
(ख) उस सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा ऐसा संकल्प पारित नहीं किया गया है।
(3) जब आरोप संसद के किसी सदन द्वारा इस प्रकार लगाया गया है तब दूसरा सदन उस आरोप का अन्वेषण करेगा या कराएगा और ऐसे अन्वेषण में उपस्थित होने का तथा अपना प्रतिनिधित्व कराने का राष्ट्रपति को अधिकार होगा।
(4) यदि अन्वेषण के परिणामस्वरूप यह घोषित करने वाला संकल्प कि राष्ट्रपति के विरुद्ध लगाया गया आरोप सिद्ध हो गया है, आरोप का अन्वेषण करने या कराने वाले सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित कर दिया जाता है तो ऐसे संकल्प का प्रभाव उसके इस प्रकार पारित किए जाने की तारीख से राष्ट्रपति को उसके पद से हटाना होगा।
भारत का संविधान – अनुच्छेद 13 – मूल अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाली विधियाँ – भाग 3 – मूलभूत अधिकार (12 – 35)
(1) इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले भारत के राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त सभी विधियाँ उस मात्रा तक शून्य होंगी जिस तक वे इस भाग के उपबंधों से असंगत हैं।
(2) राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनती है या न्यून करती है और इस खंड के उल्लंघन में बनाई गई प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य होगी।
भारत का संविधान अनुच्छेद 14- विधि के समक्ष समता – भाग 3 – मूलभूत अधिकार (12 – 35)
राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
भारत का संविधान, अनुच्छेद 39क – समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता –
39क. राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और वह, विशिष्टतया, यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए, उपयुक्त विधान या स्कीम द्वारा या किसी अन्य रीति से निःशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा।
भारत का संविधान, अनुच्छेद 375 : भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र सिविल, दांडिक और राजस्व अधिकारिता वाले सभी न्यायालय और सभी न्यायिक, कार्यपालक और अनुसचिवीय प्राधिकारी और अधिकारी अपने-अपने कॄत्यों को, इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए, करते रहेंगे।
भारत का संविधान अनुच्छेद 350 – व्यथा के निवारण के लिए अभ्यावेदन में प्रयोग की जाने वाली भाषा – भाग XVII – राजभाषा (343 – 351)
350.प्रत्येक व्यक्ति किसी व्यथा के निवारण के लिए संघ या राज्य के किसी अधिकारी या प्राधिकारी को, यथास्थिति, संघ में या राज्य में प्रयोग होने वाली किसी भाषा में अभ्यावेदन देने का हकदार होगा।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023- धारा 167: स्थानीय पूछताछ – अध्याय 11 – सार्वजनिक व्यवस्था और शांति बनाए रखना – (धारा 148 – 167)
- (1) जब भी धारा 164, धारा 165 या धारा 166 के प्रयोजनों के लिए कोई स्थानीय जांच आवश्यक हो, तो एक जिला मजिस्ट्रेट या उप-विभागीय मजिस्ट्रेट जांच करने के लिए अपने अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट को नियुक्त कर सकता है, और उसे इस तरह की जानकारी दे सकता है। लिखित निर्देश जो उसके मार्गदर्शन के लिए आवश्यक लग सकते हैं, और घोषित कर सकते हैं कि जांच के आवश्यक खर्चों का पूरा या कुछ हिस्सा किसके द्वारा भुगतान किया जाएगा।
(2) इस प्रकार प्रतिनियुक्त व्यक्ति की रिपोर्ट को मामले में साक्ष्य के रूप में पढ़ा जा सकता है।
(3) जब धारा 164, धारा 165 या धारा 166 के तहत कार्यवाही में किसी भी पक्ष द्वारा कोई लागत खर्च की जाती है, तो निर्णय पारित करने वाला मजिस्ट्रेट यह निर्देश दे सकता है कि ऐसी लागत का भुगतान किसके द्वारा किया जाएगा, चाहे वह ऐसी पार्टी द्वारा या किसी अन्य पार्टी द्वारा किया जाए। कार्यवाही, और चाहे पूरी तरह से या आंशिक रूप से या अनुपात में और ऐसी लागतों में गवाहों और अधिवक्ताओं की फीस के संबंध में किए गए कोई भी खर्च शामिल हो सकते हैं, जिन्हें न्यायालय उचित मान सकता है।
भारत का संविधान, अनुच्छेद – 140 : उच्चतम न्यायालय की आनुषंगिक शक्तियाँ, भाग – 5, संघ (52 – 151);
संसद, विधि द्वारा, उच्चतम न्यायालय को ऐसी अनुपूरक शक्तियाँ प्रदान करने के लिए उपबंध कर सकेगी जो इस संविधान के उपबंधों में से किसी से असंगत न हों और जो उस न्यायालय को इस संविधान द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त अधिकारिता का अधिक प्रभावी रूप से प्रयोग करने के योग्य बनाने के लिए आवश्यक या वांछनीय प्रतीत हों ।
भारत का संविधान – अनुच्छेद 309 – संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की भर्ती और सेवा की शर्तें – भाग 14 – संघ और राज्यों के अधीन सेवाएं (308 – 323)
309.इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए, समुचित विधान-मंडल के अधिनियम संघ या किसी राज्य के कार्यकलाप से संबंधित लोक सेवाओं और पदों के लिए भर्ती का और नियुक्त व्यक्तियों की सेवा की शर्तों का विनियमन कर सकेंगे: परंतु जब तक इस अनुच्छेद के अधीन समुचित विधान-मंडल के अधिनियम द्वारा या उसके अधीन इस निमित्त उपबंध नहीं किया जाता है तब तक, यथास्थिति, संघ के कार्यकलाप से संबंधित सेवाओं और पदों की दशा में राष्ट्रपति या ऐसा व्यक्ति जिसे वह निर्दिष्ट करे और राज्य के कार्यकलाप से संबंधित सेवाओं और पदों की दशा में राज्य का राज्यपाल या ऐसा व्यक्ति जिसे वह निर्दिष्ट करे, ऐसी सेवाओं और पदों के लिए भर्ती का और नियुक्त व्यक्तियों की सेवा की शर्तों का विनियमन करने वाले नियम बनाने के लिए सक्षम होगा और इस प्रकार बनाए गए नियम किसी ऐसे अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए प्रभावी होंगे।
भारत का संविधान – तीसरी अनुसूची;
4) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों और भारत के नियंत्रक- महालेखा परीक्षक द्वारा ली जाने वाली शपथ या किए जाने वाले प्रतिज्ञान का प्ररूप :-
‘मैं, अमुक, जो भारत के उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति या न्यायाधीश नियुक्त हुआ हूँ, ईश्वर की शपथ लेता हूँ/ सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा,मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूँगा तथा मैं सम्यक् प्रकार से और श्रद्धापूर्वक तथा अपनी पूरी योग्यता, ज्ञान और विवेक से अपने पद के कर्तव्यों का भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना पालन करूँगा तथा मैं संविधान और विधियों की मर्यादा बनाए रखूँगा।’
भारत का संविधान – अनुच्छेद 217 – उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति और उसके पद की शर्तें – भाग 6 – राज्य (152 – 237)
217.1(क) कोई न्यायाधीश, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा।
1(ख) किसी न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए अनुच्छेद 124 के खंड (4) में उपबंधित रीति से उसके पद से राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकेगा।
भारत का संविधान – अनुच्छेद 124 – उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन – भाग 4 – संघ (52 – 151)
(2)- (क) कोई न्यायाधीश राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा;
(2)- (ख) किसी न्यायाधीश को खंड 4 में उपबंधित रीति से उसके पद से हटाया जा सकेगा।
(4) उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसके पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर ऐसे हटाए जाने के लिए संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा समर्थित समावेदन, राष्ट्रपति के समक्ष उसी सत्र में रखे जाने पर राष्ट्रपति ने आदेश नहीं दे दिया है।
(5) संसद खंड (4) के अधीन किसी समावेदन के रखे जाने की तथा न्यायाधीश के कदाचार या असमर्थता के अन्वेषण और साबित करने की प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन कर सकेगी।
न्यायाधीश जाँच अधिनियम 1968
Investigation into misbehaviour or incapacity of Judge by Committee.
समिति द्वारा न्यायाधीश के दुर्व्यवहार/ कदाचार या अक्षमता की जाँच।
धारा 3 (1) यदि किसी सम्बोधन को प्रस्तुत करने के लिए किसी प्रस्ताव की सूचना दी जाती है और राष्ट्रपति ने एक न्यायाधीश को हटाने की प्रार्थना करते हुए हस्ताक्षर किये,-
क) लोक सभा में दिए गए नोटिस के मामले में उस सदन के द्वारा कम से कम सौ सदस्य;
(ख) राज्यों की परिषद में दिए गए नोटिस के मामले में उस परिषद के कम से कम पचास सदस्य,
फिर, अध्यक्ष या सभापति, जैसा भी मामला हो, वह ऐसे व्यक्तियों, यदि कोई हो, से परामर्श करने के बाद, जैसा वह उचित समझे, कर सकता है और ऐसी सामग्री, यदि कोई हो, पर विचार करने के बाद उसके पास उपलब्ध है या तो प्रस्ताव को स्वीकार करें या स्वीकार करने से इंकार करें ।
(2) यदि उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तब अध्यक्ष या सभापति, जैसा भी मामला हो प्रस्ताव रखेंगे और यह लंबित नहीं होगा इसको यथाशीघ्र गठित किया जाएगा जिस आधार पर जांच करने का उद्देश्य एक न्यायाधीश को हटाने की प्रार्थना की जाती है, जिसमें एक समिति शामिल होती है
जिन तीन सदस्यों में से –
(क) एक को मुख्य न्यायाधीश और दूसरे में से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को चुना जाएगा
(ख) उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों में से एक को चुना जाएगा और
(ग) एक ऐसा व्यक्ति होगा जो अध्यक्ष की राय में है या, जैसी भी स्थिति हो, अध्यक्ष, एक प्रतिष्ठित न्यायविद् बशर्ते कि जहां निर्दिष्ट किसी प्रस्ताव की सूचनाएं हों
धारा (1)संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन दी जाती है किसी भी उप समिति का गठन तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि प्रस्ताव को दोनों सदनों में स्वीकार कर लिया गया है और जहां ऐसा है प्रस्ताव को दोनों सदनों की समिति में स्वीकार कर लिया गया है अध्यक्ष और सभापति द्वारा संयुक्त रूप से गठित किया जाएगा बशर्ते कि जहां उपरोक्ता नुसार किसी प्रस्ताव की सूचनाएं हों संसद के सदनों में अलग- अलग तारीखों पर दिए जाते हैं बाद में दिया गया नोटिस खारिज कर दिया जाएगा।
उप-समिति न्यायिक जवाबदेही बनाम भारत संघ (1991) 4 , SCC 699,
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भारत का संविधान, अनुच्छेद – 99 : सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान, भाग 5, संघ (52 – 151)
99.संसद के प्रत्येक सदन का प्रत्येक सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने से पहले, राष्ट्रपति या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष, तीसरी अनुसूची के इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्रारूप के अनुसार, शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा।
भारत का संविधान, तीसरी अनुसूची, अनुसूचियां;
3 (ख) संसद के सदस्य द्वारा ली जाने वाली शपथ या किए जाने वाले प्रतिज्ञान का प्ररूप :-
‘मैं, अमुक, जो राज्यसभा (या लोकसभा) में स्थान भरने के लिए अभ्यर्थी के रूप में नाम निर्देशित हुआ हूँ ईश्वर की शपथ लेता हूँ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा और मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूँगा।’
भारत का संविधान, तीसरी अनुसूची, अनुसूचियाँ;
शपथ या प्रतिज्ञान के प्रारूप
(1) संघ के मंत्री के लिए पद की शपथ का प्ररूप :-
‘मैं, अमुक, ईश्वर की शपथ लेता हूँ/ सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत का संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा, (संविधान (सोलहवाँ संशोधन) अधिनियम, 1963 की धारा 5 द्वारा अंतः स्थापित।) मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूँगा, मैं संघ के मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धा पूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करूँगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूँगा।’
भारत का संविधान, अनुच्छेद – 326 : लोक सभा और राज्यों की विधान सभाओं के लिए निर्वाचनों का वयस्क मताधिकार के आधार पर होना, भाग – 15, निर्वाचन (324 – 329A);
326.लोक सभा और प्रत्येक राज्य की विधान सभा के लिए निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति, जो भारत का नागरिक है और ऐसी तारीख को, जो समुचित विधान-मंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन इस निमित्त नियत की जाए, कम से कम अठारह वर्ष की आयु का है और इस संविधान या समुचित विधान- मंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन अनिवास, चित्त विकृति, अपराध या भ्रष्ट या अवैध आचरण के आधार पर अन्यथा निरर्हित नहीं कर दिया जाता है, ऐसे किसी निर्वाचन में मतदाता के रूप में रजिस्ट्रीकृत होने का हकदार होगा।
भारतीय न्याय संहिता 2023- अध्याय 14 – मिथ्या साक्ष्य और लोक न्याय के विरुद्ध अपराधों के विषय में,255. लोक सेवक द्वारा किसी व्यक्ति को दंड से या किसी संपत्ति के समपहरण से बचाने के आशय से विधि के निदेश की अवज्ञा –
255. जो कोई लोक सेवक होते हुए विधि के ऐसे किसी निदेश की, जो उस संबंध में हो कि उससे ऐसे लोक सेवक के नाते किस दंग का आचरण करना चाहिए, जानते हुए अवज्ञा किसी व्यक्ति को वैध दंड से बचाने के आशय से या संभाव्यत: तद्द्वारा बचाएगा यह जानते हुए या उतने दंड की अपेक्षा, जिससे वह दंडनीय है, तदद्वारा कम दंड दिलवाएगा यह संभाव्य जानते हुए या किसी संपत्ति को ऐसे समपहरण या किसी भार से, जिसके लिए वह संपत्ति विधि के द्वारा दायित्व के अधीन है बचाने के आशय से या संभाव्यत: तद्द्वारा बचाएगा यह जानते हुए करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा ।
भारतीय न्याय संहिता 2023- अध्याय 14 – मिथ्या साक्ष्य और लोक न्याय के विरुद्ध अपराधों के विषय में-256. किसी व्यक्ति को दंड से या किसी संपत्ति को समपहरण से बचाने के आशय से लोक सेवक द्वारा अशुद्ध अभिलेख या लेख की रचना –
- जो कोई लोक सेवक होते हुए और ऐसे लोक सेवक के नाते कोई अभिलेख या अन्य लेख तैयार करने का भार रखते हुए, उस अभिलेख या लेख की इस प्रकार से रचना, जिसे वह जानता है कि अशुद्ध है लोक को या किसी व्यक्ति को हानि या क्षति कारित करने के आशय से या संभाव्यत: तदद्वारा कारित करेगा यह जानते हुए या किसी व्यक्ति को वैध दंड से बचाने के आशय से या संभाव्यतः तद्द्वारा बचाएगा यह जानते हुए या किसी संपति को ऐसे समपहरण या अन्य भार से, जिसके दायित्व के अधीन वह संपत्ति विधि के अनुसार है, बचाने के आशय से या संभाव्यत: तदद्वारा बचाएगा या जानते हुए करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा ।
भारत का संविधान की उद्देशिका
लेखक :रवि शेखर बौद्ध मेरठ

