Thursday, February 26, 2026
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बैंकर की जुबानी

मूकनायक/ देश

“राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा”

साथियों छोटी सी कविता के माध्यम से बैंक और बैंक कर्मी के दर्द को बयां करना चाहता हूं।


🏹पता नहीं यह किस तरह का रिश्ता है।
काजू बादाम खाओ तो फिस्ता दिखता है।।

रात को सोता हूं तो अंधेरा ही अंधेरा।
हर सुबह फिर वही सवेरा दिखता है।।

कितना भी भूलना चाहूं तेरे बजट को।
हर बीओडी के बाद बस टारगेट ही दिखता हैं।।

आप सोचते होंगे की दर्द को बयां करूं।
(banker complaint with management)
मेरा दर्द हर बार वहा आकर हटकता है।।
(CDS score)

कितनी तन्हाई सी है तू मेरी जान पहचान में।
(कस्टमर सर्विस)
नौकरी तेरे दीदार से चूल्हा सुलगता है।।
(service feedback)

दिन को रात रात को दिन समझ के खड़ा हूं।
तेरी मोहब्बत के खातिर हर जगह लड़ा हूं।।
(मार्च क्लोजिंग)

अब तो जिंदगी है बेखबरो के कदमों में।
आखिर पाला जब बैंक की नौकरी से पड़ा है।।
(ड्यूरिंग ऑडिट)

गिरकर उठना उठकर चलना यह क्रम कहता है।
कर्मवीर बैंक कर्मी कभी हार नही मानता हैं।।
(रफिया रैंकिंग)

✍️ रचनाकार
आशाराम मीणा उप प्रबंधक भारतीय स्टेट बैंक कोटा राजस्थान।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🙏🏼📘जय भारत
,जय सविधान,जय विज्ञान📘

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