Thursday, February 26, 2026
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बुद्ध धम्म में अनात्मवाद का अर्थ

मूकनायक

देश

“राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा”

” सब्बे धम्मा अनत्ताति,
यदा पञ्ञाय पस्सति ” विश्व में न कोई आत्मा है और न आत्मा की तरह कोई अन्य वस्तु, अंग, अवयवी, मांस पेशी है। चेतना है जिसे मन ( नाम ) कहते है। नाम और रूप ( चारभूतों से बना हुआ भौतिक शरीर) की जीवनधारा कुदरत के बंधे बंधाए नियमो से चलती है। बुद्ध ने कुदरत के यह नियम को अच्छी तरह समझाया है। बुद्ध ने कहा- पांच ज्ञानेन्द्रिय के आधार स्वरूप मन और मन की वेदनायें, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान, ये सब आत्मा या आत्मा के समान किसी चीज से बिल्कुल भिन्न है। बुद्ध ने शाश्वत आत्मा में विश्वास उसी हास्यास्पद कहा है, जिस प्रकार कल्पित सुंदर नारी के प्रति अनुराग रखना हास्यास्पद है।
बुद्ध के अनुसार आत्मा जैसी कोई चीज प्राणी के शरीर में नही है। अन्य धर्मी लोग अज्ञानतावश मन की चेतना को आत्मा कहते है और उस कल्पित आत्मा को अपरिवर्तनशील और अजर-अमर मानते है। वास्तव में ऐसा नही है।
प्राणियों के शरीर का संचालन मन से होता है। यह अस्थाई शरीर और मन का संकलन मात्र है।
बुद्ध की तरह जेम्स विलियम ने “आत्मा” को विज्ञान का प्रवाह (stream of consciousness) माना है।
जिस प्रकार नदी में जल के बूंदें निरंतर परिवर्तित होती रहती है, फिर भी उसमें एकमयता दिखाई देती है, उसी प्रकार “आत्मा ” के विज्ञान निरंतर बदलने पर भी उसमें एकमयता दिखाई देती है। लेकिन पहले जो स्थिति थी अब नही है, पहेले वाली स्थिति बदल चूकी है।

बौद्ध भन्ते नागसेन ने “आत्मा” के स्वरूप की व्याख्या करते हुए कहा है कि जिस प्रकार धुरी, पहिए, रस्सियां आदि के संघात विशेष का नाम रथ है। उसी प्रकार पांच स्कंधो के अतिरिक्त कोई आत्मा नही है। दूसरे शब्दों में “आत्मा ” पांच स्कंधो की समष्टि का नाम है।
बुद्ध का “आत्मा” सम्बन्धी विचार हिन्दु धर्म के आत्मा के विचार के प्रतिकूल है। हिन्दु धर्म में शाश्वत आत्मा को अपरिवर्तनीय और सत्य माना गया है। इसके विपरीत बुद्ध ने अनित्य और परिवर्तनशील मन की सत्यता प्रमाणित की है।
आत्मा के संबंध में कोई भ्रांति न रह जाय, इसलिए भगवान ने बार-बार कहा – “सब्बे धम्मा अनत्ता” सारे धर्म अनात्म हैं। सारे धर्म, यानी, सारी सच्चाइयां चाहे वे नाम और रूप तथा इंद्रियों के अनित्य क्षेत्र की हों अथवा इनसे परे नाम-रूपातीत, इंद्रियातीत नित्य, शाश्वत, ध्रुव, अवस्था की हों, ये सभी अनात्म हैं। अनित्य और नित्य, इन दोनों क्षेत्रों में कहीं किसी आत्मा का अस्तित्व नहीं है। भगवान की सिखायी हुई अनात्मवाद की शिक्षा कोई कल्पनाजन्य दार्शनिक मान्यता नहीं है।

लेखक: रवि शेखर बौद्ध मेरठ

05.11.2024

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