मूकनायक /देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
सिद्धार्थ गौतम 29 वर्ष की आयु में कपिलवस्तु के युवराज पद, अपनी पत्नी, पुत्र और पूरे राज्य का मोह त्याग कर ईसा से 534 वर्ष पूर्व यानी आज से लगभग ढाई हजार साल पहले, मानवीय दुखों के अन्त की खोज में परिव्राजक बनकर महल से निकल पड़े थे |
राज्य सीमाओं से बाहर तप कर रहे बहुत से महान संत गुरु परिव्राजक तपस्वियों आचार्यों के सानिध्य में रहकर ज्ञानार्जन किया | लेकिन उन्हें सन्तुष्टि नहीं मिली | क्योंकि वे स्वयं के कल्याण के लिये नहीं वल्कि पूरे विश्व की मानवता के दुखों के अन्त की तलाश में ही परिव्राजक बने थे | इसलिये वे आगे श्रृषिपत्तन (सारनाथ) की ओर बढ़ गये |
उन्होंने वन में जाकर स्व साधना व ध्यान से अध्ययन (खोज) का निर्णय कर लिया | उसी वन में पाँच अन्य परिव्राजक, कौण्डिन्य, बप्प, भद्दिय, महानाम, अश्वजित से भी उनकी भेंट हुई | कुछ दिन साथ रहकर उन पंचवग्गीय परिव्राजकों ने उनका साथ छोड़ दिया |
हुआ यूँ कि कठिन साधना करते हुए बोधिसत्व सिद्धार्थ गौतम शारीरिक जरूरत से बहुत कम (कभी कभी एक तिल के समान) भोजन पर ही निर्भर हो गये थे | इससे उनका शरीर सूख कर काँटे के समान हो गया |
तब उन्होंने विचार किया कि मन या प्राण तत्व और शरीर एक दूसरे पर ही निर्भर हैं | इसलिये शरीर को अतिशय कष्ट देना ठीक नहीं है | यह सोचकर उन्होंने फल फूल पत्ते कन्द या अन्य आहार लेना शुरू कर दिया | दूसरे परिव्राजकों ने यह सोचकर कि सिद्धार्थ पथभ्रष्ट हो गया है | उनका साथ छोड़ दिया |
सिद्धार्थ गौतम भी वहाँ से चलकर उरुवेला की तरफ चले गये |
कठिन ध्यान साधना के बाद 528 ईसा पूर्व पेंतीस वर्ष की आयु में त्रिविध पावनी बैसाख पूर्णिमा यानी बुद्ध पूर्णिमा के दिन उन्हें बुद्धत्व ज्ञान की प्राप्ति हुई | उन्होंने जीव जगत संसार के संचालन का संपूर्ण भेद जान लिया और वे बुद्ध हो गये | उन्होंने सृष्टि जगत की एक एक कड़ियाँ गिनी तब उन्होंने यह भी जान लिया कि संपूर्ण सृष्टि के निर्माण कार्य का कोई ना कोई कारण अवस्य होता है | उस कारण से जब कोई कार्य संपन्न होता है तो वह दूसरे
नये कार्य होने का कारण बनता है | इसी को उन्होंने ” प्रतीत्यसमुत्पाद ” कहा है |
इस प्रकार वे संसार के सभी नियमों तथ्यों से अवगत हो गये | इसीलिए वे तथागत बुद्ध कहलाये |
नमो बुद्धाय
बुद्ध जान चुके थे कि मानव जीवन प्राप्त होना संसार का सबसे बड़ा संयोग है | यह जीवन निरर्थक न जाये, इसके लिए मानव को कौन कौन से शील आचरणों को अपनाना चाहिए, ताकि उसके स्वयं के तथा संसार के दुखों का अन्त हो सके |
उनका विवेक जाग उठा | उनका मन मस्तिष्क रोमांचित होकर हर्षोल्लास से भर गया |
अब वह अपने ज्ञान को संपूर्ण जगत में बाँटना चाह रहे थे | उन्हें ऐसे ज्ञानी परिव्राजकों की खोज करनी थी जो उनके ज्ञान को ग्रहण कर सकें और ग्रहण किये हुए ज्ञान से दूसरे लोगों को भी लाभान्वित कर सकें |
इसी खोज में वे अपने पुराने साथी पंचवग्गीय परिव्राजकों के पास पहुँचे , जो उन्हें इसिपत्तन ( सारनाथ ) में ही मिल गये | तथागत बुद्ध को प्रफुल्लित देखकर सभी परिव्राजक उनके पास आकर बैठ गये | उनसे आदर पूर्वक वार्तालाप करके ज्ञान का उपदेश देने की प्रार्थना की |
यह आषाढ़ी पूर्णिमा का दिन था जिसे हम गुरु पूर्णिमा के नाम से जानते हैं | भगवान बुद्ध ने उन पाँचो परिव्राजकों को बुद्धत्व ज्ञान का उपदेश दिया |
तथागत बुद्ध ने उन्हें बताया कि–
संसार में दुख है |
दुख है तो उसका कारण है |
कारण है तो उसका निवारण है |
निवारण है तो निवारण के उपाय हैं |
यही दुख निवारण के उपाय हमें और जगत के सभी लोगों को अपनाने चाहिए |
ये निवारण के उपाय हमें जीवन के उच्चतर शिखर की ओर भी ले जाते हैं |जिससे सम्पूर्ण मानवता को सुख प्राप्त होता है और उनका दुख दूर होता है | यही धम्म मार्ग है |
दुख निवारण के मार्ग हैं —
ज्ञान की शरण में आकर धम्म के नियमों को जान लेना, उनका पालन करना |
पंचशील
आर्य अष्टांगिक मार्ग
दस पारमिता
अड़तीस मंगल सुत्त
एक सौ आठ वर्जित तृष्णाओं का नाश |
इसके बाद तथागत ने – जीवन अस्तित्व के तत्व
पदार्थ
मन
प्रतीत्यसमुत्पाद आदि का ज्ञान सभी परिव्राजकों को समझाया |
सभी परिव्राजक बुद्ध से ज्ञान पाकर धन्य हुये | उन्होंने बुद्ध की शरण ग्रहण की | बुद्ध ने इस पूर्णिमा को जो बुद्धत्व ज्ञान का उपदेश दिया | इसे ही धम्मचक्क पवत्तन सुत्त ( धर्म चक्र प्रवर्तन सूत्र- यादगार दिवस ) कहा गया है |
तथागत भगवान बुद्ध ने आज से लगभग ढाई हजार साल पहले जिन तर्क संगत, बुद्धि, विवेक, विज्ञान पूर्ण, प्राकृतिक संदेशों को संसार के सामने रखा था वह आज भी समूचे संसार में उतने ही प्रासंगिक हैं और भविष्य में भी रहेंगे |
तथागत बुद्ध के धम्म मार्ग को बुद्ध धम्म बताया गया है | यह तो अन्य धर्मों की होड़ में बुद्ध धम्म को बौद्ध धर्म कहा जाने लगा है |
सभी भारत वासी अपने मित्रों के साथ तथागत बुद्ध के उपोसथ, त्रिशरण, पंचशील व्रत, अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करें, वर्जित तृष्णाओं का त्याग करें | विशुद्ध भारतीय धम्म के प्रति यही सच्ची श्रद्धा है |
धम्मचक्क पवत्तन सुत्त की मंगलकामनायें
नमो बुद्धाय
लेखक:
डी डी दिनकर (मैनेजर)
अध्यक्ष बीएसआई
बाबा खयालीदास के पीछे
चमन गंज फफूंद
जि.औरैया (यूपी) 206247
9415771347

