मूकनायक /देश
“राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा”
बहुत से लोगों ने देखा होगा कि गाँव देहात और कस्बों में कुछ घरों में दीपावली के दूसरे दिन यानी कार्तिक माह शुक्ल पक्ष प्रथमा को गोवर्धन पूजा की जाती है | इस पूजा में घर के आँगन में गोबर से स्तूप के आकार के कुछ देवी देवता बनाये जाते हैं | उनके सामने लगभग एक गज के वर्ग क्षेत्र में गोबर की दो इंच चौड़ी एक बाउण्ड्री बना कर एक नगर जैसा माहौल बनाया जाता है | इस नगर में खेत जोतते किसान, कुएं से पानी भरती, आटा चक्की पीसती, भोजन बनाती तथा परिवार को भोजन कराती महिलाओं के नमूने गोबर से ही बनाये जाते हैं | हल बैल, गाय भैंस, कुत्ते बिल्ली और कुछ लठैत जैसे वह नगर की रखवाली कर रहे हैं तथा बाउण्ड्री के बाहर हिंसक भेड़िये आदि भी गोबर के ही बनाये जाते हैं |
अब इन सब को मिठाई भोजन सीजनल शाक सब्जियां आदि खिलाकर पूजा की जाती है | यह अपनी अपनी आस्था का विषय हो सकता है |
प्रश्न यह है कि आखिर गोवर्धन है क्या ?
गोवर्धन – –
सबसे पहले हमें जानना होगा कि ईसा से लगभग 500 वर्ष पूर्व मूलतः दो धर्म जैन धर्म और बौद्ध धर्म ही भारत में प्रचलित थे | हालाँकि उससे पहले वैदिक धर्म की कल्पना की गयी है | लेकिन वैदिक धर्म कितना पुराना है कोई ऐतिहासिक पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है | तब ये बौद्ध धर्म, धर्म नहीं वल्कि धम्म कहलाता था | जैन धर्म कठोर नियमों के कारण अल्पसंख्यक होकर रह गया | वहीं बौद्ध धर्म मध्यम मार्गीय शीलाचरण वादी सैद्धांतिक धम्म होने के कारण फैलता चला गया |
बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व हुआ था | उन्होंने बौद्ध धम्म का प्रचार प्रसार किया | तात्कालिक राजाओं के बाद मौर्य वंश, शुंग वंश, नाग वंश, कुषाण वंश और गुप्त वंश आदि सभी राजा महाराजाओं का राज सत्ता का संघर्ष रहा है | फिर भी मूलतः बौद्ध धम्म का ही पालन करते थे | कहीं कहीं बौद्ध धम्म व जैन धर्म का मिला जुला प्रभाव भी देखने को मिलता है | यह भी सही है कि ज्यादातर प्रजा भी अपने स्वामी राजा के अनुसार ही उसी धम्म का पालन करती है |
नाग वंश के बाद कुषाण वंश के शासकों का समय आता है | यह भी बौद्ध मतावलम्वी राजा या महाराजा थे |
गोवर्धन संस्कारित शब्द है | कुषाण वंशी महाराज कनिष्क राज के ऐतिहासिक काल में पूरा मथुरा (मधेपुरा) क्षेत्र कनिष्क की दूसरी राजधानी थी | यह क्षेत्र मूर्ति कला केन्द्र के रूप विकसित था | गोवर्धन जो आज सिर्फ पर्वत के रूप में दिखाई देता है वह कभी बुद्ध विरासत हुआ करती थी | महाराज कनिष्क काल की पहली और दूसरी शताब्दी ईस्वी में इस विरासत का नाम गौ बरधन या गौतम बुद्धन था | फिर गोतम बद्धन, गौबद्धन और कालान्तर में लिपि व भाषा सुधार अथवा मनुवादी करण द्वारा गोबरधन, गोवरधन और अब गोवर्धन हो गया है | इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कहीं न कहीं गोवर्धन पूजा कोई बुद्ध कालीन उत्सव रहा है | जिसे वर्तमान में काल्पनिक आस्था का त्योहार बना दिया गया है | सोचने का विषय है |
यह स्थान यानी मथुरा में गोवर्धन पूजा हमारे देश के करोड़ों लोगों की आस्था से भी जुड़ा हुआ है | आस्था के अनुसार यहाँ पर यानी मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण जी का जन्म स्थान है | ग्रन्थों में बताया गया है कि वर्षा के देवता इन्द्र के वर्षा प्रकोप से बचने के लिये भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अँगुली पर धारण कर लिया था | उसी पर्वत के नीचे सभी मथुरा वासी बच्चे बूढ़े जवान महिला पुरुष अपने अपने पालतू पशु गायें आदि लेकर कई दिनों तक शरण लिये रहे | भीगने से बचे रहे | इन्द्र हार गये |
यह घटना पौराणिक ग्रन्थों में मिलती है | हालाँकि पुरातात्विक ऐतिहासिक प्रमाण अभी तक नहीं मिला है | फिर भी किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना इस लेख का मकसद नहीं है |
कुछ इतिहास कारों का कहना है कि तथागत गौतम बुद्ध ने एक बार पूरा वर्षावास मथुरा क्षेत्र में व्यतीत किया था | वहाँ पर उनके भिक्षुओं के खाने रहने ठहरने की व्यवस्था स्थानीय निवासियों ने कर रखी थी | उनके उपदेश सुनने के लिये आसपास के क्षेत्रों के लोग भारी संख्या में आने लगे | यह सभी भिक्षुओं व अन्य लोगों को खाने के लिये अपने अपने खेतों से कुछ न कुछ जरूर लाया करते थे | कुछ लोग घरों से पकाये हुए भोजन तथा कुछ लोग भुने हुए मक्का ज्वार बाजरा व साग सब्जी फलियाँ आदि सीजनल खाने पीने का सामान लाया करते थे |
उस साल संयोग से बरसात भी खूब तेज हुई | पानी से सुरक्षा के लिये भिक्षुओं के साथ बहुत से ग्रामीण लोग पहाड़ी क्षेत्रों की ओर ऊपर चढ़ गये थे |
यह भी बताया जाता है कि इस मथुरा क्षेत्र में गोमेध यज्ञों के नाम पर गायों को बहुत काटा जाता था | तथागत के वर्षावास के समय लोगों में बुद्ध के पंचशील अहिंसा का पालन होने से इस क्षेत्र में गौहत्या में कमी आयी | जिससे गायों की संख्या में वृद्धि हुई | तथागत बुद्ध के वर्षावास के बाद भी मथुरा के क्षेत्रों में गौहत्या पर पाबन्दी बनी रही | जिससे यहाँ गायों की संख्या में बढ़ोतरी हुई | लोगों ने इसी को गौ बरधन कहा है |
लेकिन लोग आस्था के आगे इतिहास खोजने का काम नहीं करते हैं | हमारा देश आस्था के आधार पर चलता है | इतिहास और पुरातात्विक सबूत यहाँ मायने नहीं रखते हैं |
इतिहास के अनुसार कुषाण वंशी बौद्ध सम्राट महाराज कनिष्क का ईसा बाद की पहली सदी से दूसरी सदी प्रारंभ में कनिष्क साम्राज्य उज्जैन मथुरा काबुल कन्धार से लेकर तिब्बत चीन व मंगोल सीमा तक फैला हुआ था |
लेखक:
देवी दयाल दिनकर (मैनेजर)
बाबा खयालीदास के पीछे
चमन गंज फफूंद
जिला- औरैया ( उप्र ) 206247
9415771347

