मूकनायक /देश
“राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा”
राजा राम मोहन राय जी का जन्म मई 1772 में बंगाल के बर्धमान जिले में एक सामंती मनुवादी राज परिवार में हुआ था | वे बंगाली हिन्दी के साथ साथ अंग्रेजी संस्कृत अरबी फारसी का भी ज्ञान रखते थे |
उनके बड़े भाई के देहान्त पर उनकी भाभी को उनके पारिवारिक सदस्यों की सहमति से मनुवादियों ने पति की जलती हुई चिता में झोंक कर उन्हें सती कर दिया | तब राम मोहन राय छोटे थे | उन्हें अपनी भाभी से माँ की तरह प्रेम व लगाव था | राम मोहन राय विरोध करते रहे पर उनकी बात किसी ने नहीं मानी | यह हृदय विदारक दृश्य उन्होंने अपनी आँखों से देखा था | जिसकी दुःखद यादें उन्हें विचलित करने लगीं |
सामंती राज संभालने के बाद उन्होंने तीन पत्रिकाएं – ब्राम्हण वादी पत्रिका, बंगाली साप्ताहिक, संवाद कौमुदी का प्रकाशन कराया | इनमें सती प्रथा, बाल बिवाह प्रथा तथा अंधविश्वास के विरोध में लेखन कार्य शुरू कराया | इन पत्रिकाओं को जनता में मुफ्त में बँटवाया भी |
1817 से लेकर 1828 तक इन्होंने अनेकों सुधार कार्य हेतु सभाओं आन्दोलनों तथा प्रचार प्रसार द्वारा अनेकों मनुवादी कुरीतियों अंधविश्वास के खिलाफ कई उपाय किये | जो तत्कालीन समाज के लिए काफी लाभदायक सिद्ध हुए | 1825 में इन्होंने वेदान्ती कालेज की स्थापना की | 1828 में इन्होंने बृम्ह सभा की स्थापना कराई | लम्बे संघर्ष और आन्दोलन के बाद 1829 में इन्होंने अपने सामंती राज में सती प्रथा पर कानूनन रोक लगाई | कहते हैं कि इससे सती प्रथा में कमी आयी | अन्य राज्यों के राज परिवारों ने भी इनका अनुकरण करके अपने अपने राज्यों में सुधार किये | राजा राम मोहन राय जी ने तात्कालिक मनुवादी समाज के चलते इतना साहस पूर्ण कार्य किया उसकी प्रशंसा अवस्य की जानी चाहिए |
लेकिन ढीठ मनुवादी समाज और पारिवारिक खानदान द्वारा पति के मर जाने पर पति की चिता जलने तक के अल्प समय में ही बेचारी विधवा को इतना अपमानित व प्रताणित किया जाता था कि वह जीवित रहने की अपेक्षा मर जाना ही बेहतर समझ लेती, और ये मनुवादी लोग जबरदस्ती उसे नशा भाँग आदि पिलाकर चोरी छिपे शमशान में ले जाकर उसे जबरन ही पति की चिता के साथ जला देते रहे | शमशान की ओर जाती हुई ये महिलायें नशे के प्रभाव में हँसती रोती बदहवास होकर नाचते गिरते हुए चलती जिससे मनुवादी लोग विधवा का स्वेच्छा से सती होने प्रचार करवा देते |
ये तो रहा राजा राम मोहन राय जी के कार्यकाल का इतिहास |
मनुवादियों ने अंधविश्वास और कुरीतियों को दूर करने वाले राजा राम मोहन राय जी का खूब बड़ा चढ़ा कर इतिहास लिख रखा है | फिर सवाल आता है कि राजा राम मोहन राय जी ने अपने और मनुवादियों के अलावा अन्य किसी गैर सवर्ण या शूद्रों के लिये कोई सुधार कार्य जैसे जाति प्रथा उन्मूलन, ऊँच-नीच, छुआछूत, भेदभाव मिटाने आदि का कोई कार्य किया है क्या ? जवाब आता है नहीं | तो फिर इन्हें पूर्ण समाज सुधारक कैसे कहा जा सकता है ?
पूर्ण समाज सुधारक तो उन्हें ही कहा जा सकता है जो न सिर्फ अपने वल्कि औरों के समाज का भी सुधार कार्य करे | दक्षिण भारत में जब एक महिला के पति की मृत्यु हो जाती है तो उस पति की विधवा पत्नी को जबरदस्ती सती प्रथा के नाम पर जबरन उसे आग में झोंका जा रहा था | वह सहायता के लिये चीख रही थी | संयोग से एक अंग्रेज अफसर उधर आ गया वह न तो हिन्दू था और न ही भारतीय लेकिन उसने अपनी जान की परवाह किये बिना भीड़ में घुसकर अपनी पिस्तौल से गोलियां बरसाकर मनुवादियों को रोका और उस विधवा को सती होने से बचाया | उसने जिला कलेक्टर द्वारा आदेश निकलवा कर सती प्रथा पर पहली रोक लगवायी | भारत की महिलायें ऐसे अंग्रेज अफसरों फिलिप जॉन, विलियम वेंटिक का नाम भी नहीं जानती होंगी |
श्रीरंगपट्टनम के मुश्लिम शासक टीपू सुल्तान के एक ब्राम्हण मित्र राजा ट्रावनकोर के शासक थे | ट्रावनकोर राज्य में नियम था कि जब भी महाराज, उनके सेनानायक, मन्त्रिपरिषद के लोग, पुजारी,पुरोहित वर्ग के लोग राज्य देखने के लिए नगर भ्रमण हेतु सड़कों पर चलते थे तो ब्राम्हण क्षत्रिय के अलावा अन्य वर्ग के पुरुषों को अपनी महिलाओं बेटियाँ के साथ अर्ध नग्न अवस्था में अपने दरवाजे के बाहर खड़े होकर उन सभी का स्वागत करना पड़ता था | शूद्र महिलाओं को तो हमेशा ही घर के बाहर जाने पर कमर से ऊपर कोई वस्त्र पहनने का कोई अधिकार ही नहीं था | यदि कोई शूद्र महिला अपने आँचल या दुपट्टे से अपने स्तन ढँकना चाहे तो उसे स्तन कर ( मूलाकरम ) देना पड़ता था | जो एक शूद्र महिला की हैशियत से अधिक होता था | इसी के चलते एक शूद्र महिला नांगेली से जब स्तन कर मांगा गया तो क्रोध में आकर उसने अपने स्तन ही काट डाले और मर गयी | उसके पति चिरुकंदन ने अपनी पत्नी की रक्षा न कर सकने की बेवशी और लाचारी में अपनी पत्नी की जलती चिता में कूदकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली | ट्रावनकोर में ऐसी कुरीतियाँ पहले से ही चल रही थीं |
टीपू सुलतान ने ट्रावनकोर के शासक को अपना बिरोध दर्शाया, न मानने पर युद्ध हुआ | टीपू सुल्तान ने ट्रावनकोर के 800 से अधिक कट्टरपंथी सैनिक पुरोहितों को मौत के घाट उतार दिया | तब जाकर उन असहाय महिलाओं को तन ढकने का थोड़ी सी राहत मिली थी | लेकिन तन ढकने का पूर्ण अधिकार नहीं मिल सका था क्योंकि अंग्रेजी सरकार से युद्ध लड़ते हुए वह अपने ही विश्वास पात्रों के विश्वास घात की वजह से शहीद हो गये थे | ऐसे महापुरुष राजाओं को भी समाज सुधारक का दर्जा दिया जा सकता है |
दूसरे समाज सुधारक राष्ट्र संत महात्मा जयोतिबा राव फूले और माता सावित्रीबाई फूले को भी बहुत कम ही स्त्री पुरुष जानते हैं | जिन्होंने कड़े संघर्षों के बाद बिना किसी भेदभाव के एससी-एसटी, ओबीसी और अन्य सभी वर्ग की महिलाओं के लिये शिक्षा के प्रथम द्वार खोले |
दक्षिण भारत के पेरियार रामासामी नायकर ने संपूर्ण मानवता को अंधविश्वास व पाखंड से निकाल कर
वैज्ञानिक शिक्षा के लिये प्रेरित किया |
बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर ने भारत की संपूर्ण मानवता व नारी समाज को बिना किसी भेदभाव या बिना किसी लिंगभेद के सभी को समान अधिकार संविधान द्वारा दिये | वास्तव में समाज सुधारक कहलाने का ऐसे ही महापुरुषों को अधिकार है |
यदि कोई किसान अपनी कृषि का उत्पादन किसी आढ़ती को बेचता है तो वह किसान व्यापारी नहीं कहा जा सकता है |
कोई व्यक्ति अपने कपड़े अपने आप धोता है तो क्या वह धोबी है ?
कोई व्यक्ति अपने घर की जरूरत के लिए कुएं से पानी भरता है तो क्या वह कहार है ? कोई व्यक्ति अपने जूते की पॉलिस अपने हाथों से अपने घर पर ही कर लेता है तो क्या वह मोची है ?
कोई व्यक्ति अपने घर की सफाई कार्य या शौच क्रिया के बाद अपनी गन्दगी साफ करता है तो क्या वह सफाईकर्मी या स्वच्छकार है ?
इन सब का उत्तर नहीं में आता है | सही उत्तर तो वह है कि जब कोई व्यक्ति कोई कार्य पूरे समाज के लिए करता है |
राजा राम मोहन राय जी ने तो अपने परिवार सगे संबन्धियों ब्राम्हण समाज या फिर मनुवादी समाज के लिए ही सभी सुधार कार्य किये हैं | चूँकि ये कुरीतियाँ सती प्रथा, बाल बिबाह, विधवा बिबाह आदि एससी-एसटी ओबीसी समाज में व्याप्त नहीं थी और न ही उन्हें ऐसे सुधारों की जरूरत थी | ये समाज तो केवल दूसरे मनुवादी सवर्ण समाज के दुर्व्यवहार ऊँच-नीच छुआछूत भेदभाव से पीड़ित था | एससी-एसटी ओबीसी समाज की पीड़ा दूर करने के लिये तो राजा राम मोहन राय ने कोई कार्य नहीं किया | तो फिर राजा राम मोहन राय को संपूर्ण समाज का सुधारक कैसे कहा जा सकता है ? हालाँकि राजा राम मोहन राय ने अपने स्वयं के समाज के लिये ही सही लेकिन फिर भी बहुत कुछ तो सुधार अवस्य ही किया है वह भी उस काल में जबकि मनुवादी व्यवस्था चरम पर थी | इसके लिये वे प्रशंसा के पात्र अवस्य हैं |
लेकिन सच्चा समाज सुधारक वह है जो बिना किसी भेदभाव के संपूर्ण मानवता और संपूर्ण समाज के सुधार की बात करे | जैसे कि हमारे बाबा साहब डा. भीम राव अंबेडकर जी | जिन्होंने हमारे देश की सम्पूर्ण नारी जगत को पुरुष के समान बराबरी का अधिकार दिलाया | हिन्दू कोड बिल के द्वारा महिला अधिकारों को हमेशा के लिए सुरक्षित किया | अन्य शोषित वंचित समाज पिछड़े समाज को मान सम्मान के साथ जीने का अधिकार दिलाया | उनके हित अधिकार संवैधानिक रूप से सुरक्षित किये |
बाबा साहब ने शोषित वंचित पिछड़े समाज व महिलाओं के अधिकार सुरक्षित किये | बाबा साहब ने बचपन से लेकर उच्चता के शिखर पर पहुँचने की सीमा तक अनेक प्रकार के उत्पीड़न, अपमान सहे | फिर भी किसी जाति धर्म वर्ग या संप्रदाय के प्रति किसी प्रकार की कटुता या द्वेष भाव का लेसमात्र भी प्रभाव उनके भाषण या उनके लेखन में कहीं भी नहीं दिखाई पड़ता है | वास्तव में ऐसे ही महापुरुष सच्चे समाज सुधारक कहलाने योग्य हैं |
लेखक:
डी डी दिनकर (मैनेजर)
अध्यक्ष बीएसआई फफूंद
बाबा खयालीदास के पीछे
चमन गंज फफूंद
जिला- औरैया ( उप्र ) 206247
9415771347

