Thursday, February 26, 2026
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आज मुझे पहली बार मिशन के लिए पैसा मिला है, मैं एक एक पाई मिशन के लिए लगा दूंगा

मूकनायक

देश

“राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा”

बहुजनों के मसीहा, बहुजन नायक, क्रांतिकारी महान तपॅस्वी तपस्वी, महान त्यागी और वैज्ञानिक से बने समाजिक वैज्ञानिक मान्यवर साहेब कांशीराम जी के त्याग और संघर्षम भरे जीवन की दास्तान हम आपके साथ साझा करते हैं।

9 जनवरी 1982 मालिंद मेडिकल कॉलेज औरंगाबाद (यह कॉलेज भी बाबा साहेब ने बनवाया था) के मैदान में बामसेफ से डी एस 4 तक एक ऐतिहासिक दिन था। जब पहली बार मराठवाड़ा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं ने एकत्रित होकर साहेब के वजन बराबर चांदी के रुपयों से तौला। मंच पर साहेब का बयान था कि पहले कोई मेरे कपड़े धोने का पैसा देता था, कोई मेरी साइकिल पंचर का पैसा देता था, कोई मेरे कमरे का किराया देता था,कोई मेरी रोटी खाने का पैसा दिया करता था, लेकिन आज पहली बार हुआ जब मिशन के लिए सीधे कार्यकर्ताओं ने पैसा मेरे हाथ में रख दिया। मैं एक-एक पाई इस मिशन के लिए लगा दूंगा। अगर आधी रात को भी कोई आदमी मुझसे इस पैसे का हिसाब मांगेगा तो मैं मना नहीं करूंगा।

साहेब के वजन के बराबर कुल रकम 11400 रुपये हुई। 10 जनवरी को बीर तहसील के अंबा जुगाई स्थित नगरपालिका मैदान में “गाऐ राम परिषद” (अर्थात् सरकारी जमीन पर खेती करने वाले भूमिहीन लोगों को जमीन का कब्जा दिलाने का आंदोलन) के बैनर के नीचे एक कार्यक्रम हुआ। साहेब को सुनने के लिए 10,000 से अधिक लोगों का इकॅठ हूया।

इस कार्यक्रम में गुजरात से कांग्रेस सांसद हीरा लाल परमार विशेष रूप से पहुंचे। वह साहेब के इतने अनुयायी थे कि उन्होंने साहेब से कहा था कि जिस दिन आप मुझे कांग्रेस छोड़ने का इशारा कर देंगे, मैं अगले ही दिन कांग्रेस को अलविदा कह दूंगा। लेकिन साहेब ने उन्हें कभी कांग्रेस छोड़ने का इशारा नहीं किया। कार्यक्रम खत्म होने के बाद दोपहर 2 बजे हीरा लाल परमार को नांदेड़ बस स्टैंड तक छोड़ने के लिए साहेब पैदल खुद गए और 2 किलोमीटर पैदल चलकर दिगंबर राठौड़ के साथ लौटे।

यहां आपको एक खास बात बता दूं कि साहेब बिल्कुल भी थकते नहीं थे। मिशन के प्रति उनका प्रेम इतना था कि वे कई-कई दिनों तक बिना खाए ही रहते थे। यदि कोई कार्यकर्ता उनसे खाने के लिए कहता कि साहेब जी, आप कई दिनों से भूखे हैं, तो साहेब मजाकिया लहजे में कहते कि मैं तो खा लूंगा क्योंकि कोई है जो मूझे खाने के लिए कह रहा है। लेकिन मैं अपने समाज के उन लोगों के बारे में सोचता रहता हूं जिनके पास खाने के लिए पूछने वाला भी कोई नहीं है। इसके बारे में सोचने मात्र से मुझे भूख ही मर जाती है।

जो मान-अपमान की परवाह किए बिना सक्रिय रहेगा, वही समाज में बदलाव ला सकता है- साहेब कांशीराम।

प्रस्तुत करते है।
इंजीनियर तेजपाल सिंह
94177-94756
पुस्तक मैं कांशीराम बोलता हूं।
लेखक-पम्मी लालो मजारा। 95011-43755

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