मूकनायक
देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
किसी की बुराई करना और किसी की बुराई सुनना, दोनों ही वैचारिक दुर्बलता के लक्षण हैं। जो लोग आपके सामने दूसरों की बुराई करते हैं, सच समझना निश्चित ही वो लोग दूसरों से आपकी बुराई भी करते होंगे। बुरा करना ही गलत नहीं है, अपितु बुरा सुनना भी गलत है। हम प्रतिदिन जैसा सुनते हैं, देखते हैं , वही होने भी लग जाते हैं। स्वस्थ अथवा स्वच्छ विचार ही जीवन की प्रसन्नता का मूल है। उन लोगों से अवश्य ही सावधान रहने की जरुरत है, जिन्हें दूसरों की बुराई करने में रस की प्राप्ति होती हो। विचारों का प्रदूषण विज्ञान से नहीं अपितु स्वयं के अन्तः ज्ञान से ही मिटाया जा सकता है। विचारों का प्रदूषण फैलने का कारण हमारी वो आदतें हैं जिन्हें किसी की बुराई सुनने में रस आने लगता है। बुराई को सुनना, बुराई को चुनना जैसा ही है क्योंकि जब हम बुराई सुनना पसंद करते हैं तो बुराई का प्रवेश हमारे विचारों के माध्यम से हमारे आचरण में स्वतः होने लगता है। संबंधों को संभालना जीवन की एक बहुत बड़ी कला है। आज के आधुनिक समय में हम अन्तरिक्ष में उड़ना सीख गए, समुद्र में तैरना सीख गए पर जमीन पर रहना भूल गए। हमने इमारतें बड़ी बना ली पर दिल छोटा कर लिया। हमने रास्तों का चौड़ीकरण कर दिया पर जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को अति संकीर्ण बना दिया है। हमने साधन कई गुना बढ़ा लिए पर अपना मुल्य कम कर लिया। हमने ज्यादा बोलना सीख लिया पर प्रिय बोलना छोड़ दिया। हम कहीं तक विचारों से तो सम्पन्न हुए हैं, पर आचरण से बड़े दरिद्र हो गये हैं। वर्तमान के इस भौतिक युग में प्रगति के साथ हमारी दुर्गति भी बहुत हुई है। इस आधुनिक परिवेश में नित्य सद विचारों/सत्संग से इस मानव जीवन को आनंदमय बनायें। सत्संग रूपी सद विचारों से जीवन में मानवीय गुणों की वृद्धि होती है तथा अमानवीय गुण धीरे धीरे घटने लगते हैं, जिससे हमें संबंधों के प्रति हमारे कर्तव्यों का बोध भी होता है। खुशियां पैसों से खरीदी नहीं जा सकती, खुशियां इस बात से मिलती हैं की हम कैसा महसूस कर रहें हैं ? दूसरों से कैसा व्यव्हार कर रहे हैं ? और दूसरे के व्यवहार का कैसा जवाब देते हैं? बुराई से बुराई कभी खत्म नहीं होती। घृणा को तो केवल प्रेम द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है, यह एक अटूट सत्य है। असंतोषी मन इस संसार का सबसे दुःखी मन है। जिस मन में संतोष नहीं वह बहुत कुछ प्राप्ति के बावजूद भी अतृप्त ही रहेगा। धन के बल पर भोग अवश्य प्राप्त हो जाते हैं मगर तृप्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती है। धन के बल पर पूरे संसार के भोगों को प्राप्त करने के बाद भी तुम अतृप्त ही रहोगे। रिक्तता , खिन्नता, विषाद (यानी दुख, उदासी गम), अशांति तुम्हारा पीछा ना छोड़ेगी। असंतोष के कारण ही मानव पाप और निम्न आचरण करता है। जगत के सारे पदार्थ मिलकर भी मानव को सन्तुष्ट नहीं कर सकते हैं। एक मात्र संतोष ही मानव मन को प्रसन्न रख सकता है। प्रकृति पर विश्वास हो तो अभाव में भी कृपा का और प्रत्येक क्षण आनन्द का अनुभव होगा। विषय के लिए नहीं वसुदेव (यानी जिसका वास, निवास और जिसकी प्रभुता सबके ऊपर हो), के लिए जियो। धन जीवन की आवश्यकता है, उद्देश्य कदापि नहीं। विषय भोग से आज तक कोई तृप्त नहीं हो पाया। मानवहित में ही तृप्ति का अनुभव प्राप्त किया जा सकता है।इंसान वह नहीं जो चेहरे से दीखता है, इंसान वह है जो सोच से दीखता है। मन की भावना/सोच को संभालने वाला व्यक्ति हमेशा ज़िन्दगी की उंचाई में सबसे ऊपर होता है।ताकत बढ़ती हैं जब हम हिम्मत करते हैं एकता बढ़ती हैं जब हम एक जुट होते हैं प्यार बढ़ता हैं जब हम साझा करते हैंऔर रिश्ते बढ़ते हैं जब हम परवाह करते हैं, परन्तु वैचारिक दुर्बलता को दूर करके ही जीवन शैली को सुधारे जा सकता है।
लेखक✍️ C P SINGH RAWALइंद्रा नगर, गली नंबर 3, खैर रोड अलीगढ़।7906991007

