मूकनायक
देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
वाल्मीक रामायण में वाल्मीक की कथा बुद्धकाल के अंगुलिमाल की कथा से पूरी तरह मेल खाती है स्वयं ही विचार करें |
मनुवादी ग्रन्थों के अनुसार वाल्मीक एक भयंकर लुटेरा था जो रास्ते से गुजरने वाले किसी भी परदेशी को लूटता रहता था | विरोध करने पर उन राहगीरों की हत्या भी कर देता था | एक बार कुछ संत महात्मा उस रास्ते से गुजर रहे थे | वाल्मीक ने उन पर हमला कर दिया | संतो ने उससे पूछा कि तुम ये अपराध किसके लिये कर रहे हो ?
वाल्मीक ने कहा कि मैं इस लूटे हुये धन से अपने परिवार के लोगों का भरण पोषण करता हूँ |
संतों ने उससे कहा कि अपने परिवार वालों से पूछकर आओ कि जो तुम लूट पाट का अपराध करते हो | उस अपराध का भागीदार आपके परिवार का कौन कौन सदस्य है ?
वाल्मीक ने कहा कि तुम बहाना कर रहे हो | ताकि तुम भाग सको | संतों ने उसे भरोसा दिलाया कि हम भागेंगे नहीं | यदि तुम्हें संदेह है तो तुम हम सभी को मजबूत रस्सियों से पेड़ में बाँध सकते हो | वाल्मीक ने ऐसा ही किया उन्हें मजबूत रस्सियों से बाँधा और अपने घर पूछने चला गया | उसकी बात सुनकर परिवार के सभी सदस्य बोले | परिवार का पालन पोषण करना तुम्हारी जिम्मेदारी है | परिवार का पालन पोषण करने हेतु अच्छा बुरा जो भी कार्य करोगे उसके लिए सिर्फ तुम ही जिम्मेदार होगे |
यह सुनकर वाल्मीक का मन मस्तिष्क ग्लानि से दुखी हो गया | बार बार उसके मन में यही सवाल उठ रहा था कि मैं जिनके लिए अपनी जान जोखिम में डालकर इतना सब कुछ कर रहा हूँ | लेकिन वे सब मेरे अपराधों में कोई शामिल नहीं | लौटकर आकर उसने सभी संतों से माफी माँगी और संतों के मार्ग का अनुकरण करने निवेदन किया |
चूँकि वाल्मीक अनपढ़ अशिक्षित और गँवार था उसे ज्ञान की कोई बात समझ नही आती थी | इसलिए संतों ने राय दी कि वो मरा मरा का जाप करे |
कहा जाता है कि निरंतर मरा मरा कहते कहते उसके मुँह से राम राम शब्द का उच्चारण होने लगा | कहा जाता कि वह राम राम का जाप करने में इतना तल्लीन हो गया कि उसके शरीर में बालमीकि यानी चींटियों ने बिल बना लिये थे | राम की महिमा से उसे संस्कृत का ज्ञान हो गया | वह राम भक्ति में इतना डूब गया कि चींटियों ने उसके शरीर में अपने बिल या घर बना लिये | चींटियों के घर को बालमीकि कहा जाता है | अतः उसका नाम बालमीकि पड़ गया |
पाठक यहाँ सोच सकते हैं कि केवल मरा मरा या राम राम कहने मात्र से किसी को संस्कृत का ज्ञान कैसे हो सकता है ? और वो भी इतनी कठिन संस्कृत कि रामायण जैसा ग्रन्थ लिख सके | हमारे पूर्वज रात दिन राम राम का जाप करते रहे लेकिन वे अपना नाम लिखना भी नहीं सीख पाये | अंगूठा टेक ही बने रहे |
दूसरे यह कि उसके शरीर में चींटियां बिल बना लें और उसे इसका पता भी न चले |
चींटियां अपना घर बनाने में कम से कम एक सप्ताह तक का समय लेती हैं | और कई सप्ताह तक उस बिल में रहती हैं | इतने दिनों तक कोई व्यक्ति भूखा प्यसा बिना हिले डुले कैसे रह सकता है | ये तो रही हमारे ग्रन्थों की पौराणिक कथा जिस पर करोड़ों लोगों की आस्था है | किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना सही नहीं है |
अब बुद्ध के ऐतिहासिक काल में आते हैं | बुद्धकाल में अंगुलीमाल नामक महाकाय शक्तिशाली लुटेरा था | वह अपने रास्ते में आने वाले किसी भी राहगीर को लूट लेता था | वह खूँखार दरिन्दा था राहगीर की हत्या कर देता था या फिर उसकी एक उँगली काटकर अपने गले की माला में डाल लेता था | उसने योजना बना रखी थी कि एक हजार लोगों की उँगली की माला बनाऊँगा | इसलिए उसके अपराध अत्याचार और लूट पाट भी बढ़ गये थे | घने जंगल में छिप जाता था | कब बाहर आ जाये किसी को कुछ भी पता नहीं था | घने जंगल के कारण राजा के सैनिक भी उस क्षेत्र में जाने से डरते थे | कहानी बहुत बड़ी है लेकिन यहाँ पर संक्षेप में लिखा जा रहा है |
भगवान बुद्ध ने सुना तो उन्होंने उस क्षेत्र में जाने का निश्चय कर लिया | उनके अनुयायी दुखी थे मगर जानते थे कि बुद्ध ने अगर निश्चय कर ही लिया है तो उन्हें रोक पाना संभव नहीं है |
बुद्ध उसी रास्ते पर जा रहे थे जिस रास्ते में अँगुलीमाल का निवास था | बुद्ध को देखकर अँगुलीमाल पहले तो खुश हुआ पर यह क्या बुद्ध तो निडर होकर उसी की ओर आ रहे थे | जिसके डर से बड़े बड़े सूरमा भाग खड़े होते थे |
अँगुलीमाल बुद्ध के चेहरे की निडरता और तेज को निहार रहा था | उसके देखते देखते बुद्ध आगे निकल गये | अँगुलीमाल को होश आया तो बोला ठहर जा | बुद्ध रुक गये और बोले मैं तो ठहर गया | तू कब ठहरेगा ? अँगुलीमाल निशब्द था |
बुद्ध बोले तुम में कितनी शक्ति है | अँगुलीमाल बौला मुझमें इतनी शक्ति है कि एक साधारण व्यक्ति के सामने प्रदर्शित भी नहीं कर सकता |
बुद्ध बोले क्या तुम इस ऊँचे पेड़ से एक पत्ती तोड़कर ला सकते हो ?
अँगुलीमाल ने कहा क्यों नहीं और झट से कुछ पत्तियां तोड़कर बुद्ध के सामने रख दीं | बुद्ध ने कहा अब आप इनमें से कोई एक पत्ती उठाकर पेड़ के उसी स्थान पर उसी तरह जोड़ दो जैसी वह पहले थी | अँगुलीमाल बोला ऐसा कैसे हो सकता है टूटी हुई पत्ती दुबारा नहीं जुड़ सकती है |
अब बुद्ध बोले जब तुम जोड़ नहीं सकते तो प्रकृति की संरचना को तोड़ते ही क्यों हो | तुमने मनुष्य के रूप में जन्म पाया है इसलिये मनुष्यता का धर्म निभाओ |
फिर उन्होंने अपना परिचय दिया | मैं कपिलवस्तु का युवराज था | मानवता की रक्षा और मानव समाज के दुखों का अन्त खोजने के लिये निकला हूँ | क्या तुम मेरा साथ दोगे ?
अँगुलीमाल ने तत्काल अँगुलियों की माला तोड़कर फेंक दी और बुद्ध के चरणों में नतमस्तक हो गया |
बुद्ध अपने संघ की तरफ वापस लौटे , उनके पीछे पीछे अँगुलीमाल सिर झुकाकर आ रहा था |
बुद्ध ने उसको दीक्षा दी और संघ में शामिल करने की अनुमति दे दी |
अँगुलीमाल के बुद्ध की शरण में आना सुनकर आस पास के अनेक राजाओं में हर्ष फैल गया उनकी चिन्तायें दूर हुई |
अब अँगुलीमाल बुद्ध की शरण ग्रहण कर चुका था | उसके मन मस्तिष्क से घृणा द्वेष हत्या लूट पाट का भाव बदले की भावना का पूरणतयः अन्त हो चुका था | दया करुणा मैत्री का भाव उत्पन्न हो चुका था |
संघ के नियमानुसार उसे भिक्षाटन के लिए उसी नगर में जाना पड़ा जहाँ के दर्जनों लोगों को उसने लूटा था, मारा था या उनकी उँगली काटी थी | उन लोगों व उनके परिवार के लोगों ने उस पर कंकड़ पत्थरों से उसे बुरी तरह मारा पीटा | अँगुलीमाल लहूलुहान हो गया लेकिन उसने पलटकर विरोध नहीं किया | चोटों से घायल हो कर रास्ते में गिर पड़ा उसके बहते खून में चींटियां लग गयीं लेकिन उसने आह तक नहीं की |
दूसरे बौद्ध भिक्षुओं ने देखा तो उसे भिक्खु संघ में वापस लाये | उन्होंने बुद्ध को बताया, भगवान गाँव वालों ने इस अँगुलीमाल को कंकड़ पत्थर से बहुत मारा है | इसका शरीर लहू लुहान हो गया, खून में बालमीकि (चींटियां) लग गयी मगर इसने आह तक नहीं भरी और न ही किसी पर पलट कर क्रोध प्रकट किया | वहीं पर कुछ भिक्षुओं ने उसे बालमीकि कहा |
भगवान बुद्ध ने उसकी स्वयं उपचार व्यवस्था की | अँगुलीमाल शीघ्र ही स्वस्थ होने लगा | तथागत बुद्ध ने उसका नाम अहिंसक रख दिया और भिक्खु संघ में अहिंसक के नाम से जाना जाने लगा | कौशल के महाराज प्रसेनजित ने उसे संपूर्ण राज्य में संरक्षण प्रदान कर दिया |
अँगुलीमाल बहुत ही तीक्ष्ण बुद्धि का व्यक्ति था | अल्प समय में ही उसने बुद्ध बहुत सारे सूत्र विनय सिद्धान्त याद कर लिये थे | उसे बुद्ध के धम्मपिटिक का गहरा ज्ञान हो चुका था | सबसे बड़ी बात वह इन सभी नियमों सिद्धान्तों पंचशील अष्टांगिक मार्ग का भली भाँति पालन भी करता था |
उसे बुद्ध संघ द्वारा अरिहन्त की उपाधि भी दी गयी | धम्मपिटिक के विनय सूत्र लेखन कार्य में अँगुलीमाल की सबसे बड़ी भूमिका थी |
डी डी दिनकर अध्यक्ष
बीएसआई फफूंद जिला औरैया
लेखक : :देवी दयाल दिनकर (मैनेजर)
बाबा खयालीदास के पीछे
चमन गंज फफूंद
जिला- औरैया ( उप्र ) 206247
9415771347

