मूकनायक
देश /उत्तर प्रदेश
ओमप्रकाश वर्मा
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बुद्ध का उनके सद्गुण, ज्ञान और गरिमा के अनुरूप, तृष्णा-विमुक्ति, तर्कपूर्ण और , सारगर्भित कथन सुनकर मंत्रियों ने उत्तर दिया:-
” है,सिद्धार्थ गौतम, आपका यह संकल्प एक श्रेष्ठ परामर्श है और किसी भी तरह अनुपयुक्त नहीं है, किंतु केवल वर्तमान समय के लिए अनपयुक्त है। यह किसी भी तरह आपका कर्तव्य नहीं हो सकता कि स्नेहपूर्ण कर्तव्य के बजाय आप अपने पिता को वृद्धावस्था में दुख में छोड़कर चले जाएं। निश्चित से आपकी बुद्धि बहुत सूक्ष्म नहीं है, अथवा यह कर्तव्य, धन, वैभव को समझ पाने में कौशल नहीं है, जबकि किसी अदृश्य परिणाम के लिए आप विद्यमान लक्ष्य का त्याग करके जा रहे हैं।”
“फिर कुछ कहते हैं की पुनर्जन्म है, दूसरे विश्वास के साथ रहते हैं कि नहीं है। जब इस विषय में इतना संदेह है तो फिर यही उचित है कि आप उन भोगों का आनंद ले जो आपको प्राप्त हो रहे हैं, यदि परलोक में कोई कार्यकलाप है, तो हम अवसर आने पर उसका भी आनंद भोग लेंगे, किंतु यदि इस जीवन से अलग कोई कार्यकलाप है ही नहीं, तो फिर संपूर्ण संसार के लिए बिना प्रयास के मुक्ति निश्चित है।”
“कुछ कहते हैं की पुनर्जन्म है, किंतु वे मोक्ष की कोई संभावना नहीं मानते। उनका कहना है कि जैसे अग्नि स्वभाव से ही उष्ण होती है और पानी स्वभाव से ही तरल होता है,इसी प्रकार हम सभी स्वभाव से ही संसरण शील है। कुछ काम मत है, सभी प्रकार की वस्तुएं स्वभावज है-
चाय अच्छी हो, चाहे बुरी हो, चाहे सत हो, चाहे असत हो-और जब यह सारा संसार ही स्वभावज है, इसलिए भी हमारे सब प्रयास व्यर्थ है।”
“जब इंद्रियों की प्रक्रिया निश्चित है और बाह्म पदार्थों की अनुकूलता-प्रतिकूलता भी-तो फिर जिसका वृद्धावस्था और कष्ट से अटूट संबंध है, उसे कौन कैसे बदल सकता है ? क्या यह सब प्राकृतिक ही नहीं है ? पानी तो आग को बुझा देता है और आग भी पानी को भाप बनकर उड़ा देती है। यह सभी तत्व जब मिलकर एक हो जाते हैं तो एकरूपता में संसार का निर्माण करते हैं।”
” गर्भ में स्वाभाविक रूप से हाथ,पाव,पेट, पीठ और सिर द्वारा संयुक्त रूप में उत्पन्न होता है और फिर चेतना शक्ति मिल जाती है। विद्वानों का कहना है कि यह सब प्राकृतिक ही है”
” कांटो के तीखेपन को कौन उत्पन्न करता है? अथवा पशुओं और पक्षियों के विभिन्न स्वभावों की कौन रचना करता है? यह सब प्राकृतिक ही है। कोई भी कार्य ऐसा नहीं जिसमें चेतन कारण हो, तो फिर ‘चेतना’ का अस्तित्व ही कैसे हो सकता है?”
“कुछ का कहना है कि यह सृष्टि ईश्वर की रचना है। यदि ऐसा है तो फिर किसी चेतन आत्मा के प्रयत्नशील होने की आवश्यकता ही क्या है? जो सृष्टि की गति का कारण है, वही उसे गति को अवरुद्ध भी करेगा। कुछ कहते हैं की प्राणी का जन्म और मरण दोनों ‘आत्मा’ पर निर्भर करते हैं। किंतु उनका कहना है कि प्राणी का जन्म तो अनायास होता है, किंतु मोक्ष तो प्रयास द्वारा ही प्राप्त होता है। आदमी संतानोत्पत्ति द्वारा पितृ-ऋण से उऋण होता है, पवित्र विद्या द्वारा ऋषि -ऋण से और यज्ञों द्वारा देव-ऋण से, वह इन तीनों ऋणों के साथ पैदा होता है।- जो इन तीनों ऋणों से मुक्ति है,वही वास्तव में मुक्त है”
“इसलिए नियमों के इस क्रम द्वारा विद्वान व्यक्ति उसे मुक्ति का आश्वासन प्रदान करता है, जो प्रयासरत होता है। और जो इस क्रम के बिना पूरी शक्ति के साथ भी मुक्ति के लिए प्रयास करते हैं उन्हें केवल थकावट ही प्राप्त होती है।”
“इसलिए है सौम्या तरुण! यदि मोक्ष की ही चाहा है तो उचित ढंग से शास्त्र क्रम का पालन करो, इस प्रकार आपको भी ‘मोक्ष’ प्राप्त हो जाएगा और राजा भी दुख से मोक्ष पा जाएगा। और जहां तक आपको वन से दुबारा ग गृहस्थ में वापस लौट आने पर होने वाली बुराई की आशंका है, तो इस विचार से चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। पूर्व समय में भी लोग वन जाकर वापस गृहस्थ में लौटे हैं” उन्होंने बताया जैसे अंबरीश, द्रुमकेश, राम आदि लौट कर आए थे।
भगवान बुद्ध का मंत्री को उत्तर- शेष, देखते रहिए
‘धार -धम्मसंदेश’
जे एस राना Ex-Adgc(आगरा)
संस्थापक-9457870659
अखिल भारतीय मंगल मैत्री महासंघ रजि.

