मूकनायक देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
*_✍🏻नरेन्द्र मेश्राम_* यदि आपके जेहन में पालि को राष्ट्रीय धरोहर से लेकर सम्पूर्ण एशिया में भाषाई क्रांति लाने की रणनीति नहीं है तो आप कितने ही वजनी पत्थर छिछले पानी पर मारते जाईये, वे सभी वजनी पत्थर लहरों के साथ छिटककर किनारे पर आ जायेंगे. इस आलेख की जो पहली लाईन है, वही इसकी अंतिम लाईन भी है. शास्त्रीय भाषाएँ किसी भी देश की सांस्कृतिक विरासत की संरक्षक होती है. 20 बरस बाद सरकार ने देश में भाषायी क्रांति का प्रतिपादन कर कुल 11 शास्त्रीय भाषाओं को पुरातन ग्रंथों के 1500 वर्षों से अधिक के इतिहास, भाषा के प्राचीन साहित्य, ग्रंथों, कविताओं, नाटकों का संग्रह आदि को खंगालने के बाद 2004 में तमिल, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और ओडिया और 2024 में मराठी, बंगाली, असमिया, पालि और प्राकृत को शास्त्रीय भाषा के रूप में स्थापित किया लेकिन देश का दुर्भाग्य कहे या नियति. अधिकांश प्रांतीय भाषाएँ अपने राज्यों की सीमाएँ नहीं लॉंघ सकी. जबकि संस्कृत, पालि और प्राकृत किसी भी राज्य की आधिकारिक अथवा बोलचाल की भाषा नहीं रही हैं. फिर भी इन्हे भाषा विज्ञान विशेषज्ञ समिति द्वारा सर्वसम्मति से शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया, उसके आधार क्या है ? यह भाषा विज्ञान विशेषज्ञ समिति की फाईलों में दफन है. विषय संदर्भ में मैं आगे सवाल खड़ा करूँगा जो शायद सभी को नागवार गुजरे. देश में शास्त्रीय भाषाएं प्रत्येक समुदाय के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के मील के पत्थर है. शास्त्रीय भाषाओ को दर्जा देने के पीछे कहानी यह है कि इससे आने वाली पीढ़ियां उस धरोहर को भली भाँति समझे. हमारा देश इतिहास में मराठी के समृद्ध सांस्कृतिक योगदान को मान्यता देता है. मराठी दर्ज इतिहास में भारतीय विरासत का आधार रही है. जैसे मराठी महाराष्ट्र का गौरव होकर राष्ट्र स्तर पर बोलचाल भाषा शैली में प्रमुखता से है. वैसे अन्य प्रांतीय भाषाओ को राष्ट्रीय स्तर पर वह रुतबा हासिल ना हो सका. यह सच है कि केंद्र शास्त्रीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन तथा इन भाषाओं की समृद्ध विरासत को संरक्षित करने के लिए कदम उठा रहा है. फिर भी प्राकृत और पाली का संबंध बिहार से होने के बावजूद वह इस राज्य की आधिकारिक भाषा नहीं है. जिस तरह 2013 में महाराष्ट्र सरकार की ओर से मराठी भाषा के लिए प्रस्ताव प्राप्त हुआ था उसी तरह क्या अन्य राज्यों से भाषाओं को शास्त्रीय घोषणा के लिए प्रस्ताव प्राप्त हुए थे। इसकी जानकारी अभी अज्ञात है. शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता दिए जाने पर बौद्ध अनुयायियों ने केन्द्र सरकार का आभार व्यक्त कर भारतीय संस्कृति को शोभायमान रखा. पालि भाषा बौद्धों के लिए पवित्र भाषा है क्योंकि यह थेरवाद बौद्ध धर्मग्रंथों की भाषा है. जिसमें तथागत बुद्ध की मुख्य शिक्षाएँ शामिल हैं. यह अनुयायियों को बौद्ध धर्म की ऐतिहासिक जड़ों से जोड़ता है. तथागत बुद्ध ने अपने उपदेश देने के संचार माध्यम के रूप में पाली भाषा का प्रयोग किया और उनके अनुयायियों ने उनकी शिक्षाओं को पूरे विश्व में फैलाने के लिए इसी भाषा को सशक्त बनाया.पालि भाषा को भारत की जमीं पर उतारने के लिए जब तक आपके पास UGC जैसे संस्थान में मजबूती ना हो, यह दिवा स्वप्न देखने जैसा साबित होगा. प्राकृत और पालि जैसी भाषाओं को जनमानस तक संचार का माध्यम बनाने के लिए रचनात्मकता ग्राफ, एजेंडा, विश्वविद्यालय की पिरामिडिया अवस्था, धरातल पर उतारने की विधितंत्र, आडियोलॉजी, भाषा अध्ययन के लिए स्पेशल सेंटर, वित्तीय सहायता प्रबंध, संकट से बचने के लिए सत्तात्मक पहुंच, सरकार से बजट की दरकार, भाषा विद्वान की उपलब्धता, प्रोफेसर, व्याख्याता, आधुनिक संरचना, लिंग्विस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर फंड(LIF), यदि नहीं हो तो यह केवल खोखलापन होगा. क्योंकि पाली भाषा का समृद्ध इतिहास केवल त्रिपिटक में ही नहीं सम्राट अशोक महान के कार्यकाल के बाद आज भी साहित्य लेखो, शिलालेखों, स्तंभों और जमीनदोज़ हो चुके अवशेषों, चैत्य, विहारों और स्तूपों में अंकित है. जिन्हें सदियों पूर्व नष्ट करने के प्रयास किये गये थे. वह अपनी कहानी अपनी जुबानी बोलेंगे यदि स्कॉलर्स, खोजकर्ता, अन्वेंषक, रिसर्च फैलोशिप के माध्यम से पालि साहित्य के इतिहास और उसके भविष्य को आधार रखकर कोई रणनीति तैयार की जाएगी तब शास्त्रीय भाषाओं के माध्यम से भाषाओं की संस्कृति, इतिहास और संरक्षण को बचाने की कवायत हमारे लिए गौरवशाली क्षण हो सकते हैं. भाषा का विज्ञान और उसका अध्ययन वैज्ञानिक होता है। उसकी स्थापना के लिए मुक्त विश्वविद्यालय, आर्थिक सुदृढ़ता आवश्यक है. पालि जैसी भाषा विज्ञान को स्थापित करने के लिए उसके विषय में जिज्ञासा, शंकाओं का समाधान, प्राचीन साहित्य की उपलब्धता, अनुवाद करने वाली तथा स्वयं टाइप करने वाली एवं इसी प्रकार की मशीनों के विकास और कंप्यूटर प्रणाली निर्माण में सहायता, भाषा, लिपि आदि में सरलता, शुद्धता आदि की दृष्टि से परिवर्तन-परिवर्द्धन में तकनीकी सहायता की हर तकनीकी प्राप्त होना चाहिए. तभी हम सभी एक सूत्र में पिरोकर अपना लक्ष्य तय कर सकते हैं. यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि महान् सम्राट अशोक का अखंड भारत ईरान, इराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, म्यांमार, मंगोलिया से लेकर चीन तक रहा है। संपूर्ण एशिया में पालि की इतनी बड़ी धम्म विजय की पताका लहराने और साम्राज्य खड़ा करने के बाद यदि हम उस अखंड भारत के स्वप्न को कारगर नहीं कर सकते हैं तो ऐसी स्थिति में केवल भारत तक पालि भाषा का सिमटकर रह जाना बहुत बड़ी नाकामी होगी। यदि आपके जेहन में पालि को राष्ट्रीय धरोहर से लेकर सम्पूर्ण एशिया में भाषाई क्रांति लाने की रणनीति नहीं है तो आप कितने ही वजनी पत्थर छिछले पानी पर मारते जाईये, वे सभी वजनी पत्थर लहरों के साथ छिटककर किनारे पर आ जायेंगे
लेखक.meshramnk2000@gmail.com

