मूकनायक
देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
तदवीर कर कुछ ऐसी,न आंसूओं से तकदीर लिख,
उठ,खड़ा हो अये मजलूम,न वेवसी का इतिहास लिख।
तेरे पुरखों ने, रस्सी से, चट्टानों पर निशान उकेरे हैं,
शमशीर वीरों के,दिल बदल डाले हैं,
तू!बदलाव से खौफजदा हैं,
तेरे पुरखों ने,न जाने कितनी सल्तनतों के ताजो-तख्त, बदल डाले हैं।
हम बदल नहीं सकते,बिके कलमकारों को,
डरपोक,बुजदिल विपक्ष, बहादुर बन नहीं सकता,
मौत के आगोश में सोई जनता हो जहां, मुर्दों के देश में, लोकतन्त्र जिन्दा रह नहीं सकता।
गर, श्मशान में, बस्तियां बसानी हो,
तो जिन्दगी से मायूस मुर्दों को,मौत से लडना सिखाना होगा।
बे मुरउअत, तानाशाही हुकुमरानों की क्या बिसात,
बस मजलूम को,जिंदगी की खातिर,जान हथेली पर रखना , सिखाना होगा।
बहुत बुजदिली में जी लिए हम,
फिरका परस्ति, धर्म बन्दगी, में जी लिए हम,
धर्म के नशेमें, मदहोश, आपस में लड़ते रहे,हम इंसानियत का खून बहाते रहे हम,
अब तो इंसानियत की खातिर,
इन ज़ाहिल,फिरका परस्तों को, वतन परस्त, इंसान बनाना होगा।
लेखक::: भगवत नारायण कांछी, झांसी उ.प्र.
भवतुसब्बमंगलम्

