Thursday, February 26, 2026
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सामाजिक क्रांति के पुरोधा नारायण गुरु जी के स्मृति दिवस (20 सितम्बर ) के अवसर पर भावपूर्ण आदरांजलि और नमन ।” नारायण गुरु- जीवन परिचय “

महान समाज सुधारक नारायण गुरु जी का जन्म केरल, त्रिवेंद्रम के निकट चेम्माजन्ति गांव में 26 अगस्त, 1854 को ताड़ी बनाने वाली ईजवा पिछड़ी जाति में जन्म हुआ था। बचपन से वे तीव्र बुद्धि, शिक्षा के जिज्ञासु, तर्कशील और अंधविश्वास विरोधी थे। छुआ छूत से ग्रसित गुरुकुल में शिक्षा के लिए ये बाहर बैठते थे। फिर बाद में वे ईजवा जाति के छात्रावास पढने लगे जहाँ वे अक्सर ध्यान मग्न हो जाते थे । अपने सुखी पारिवारिक जीवन में उनकी पत्नि की मृत्यु हो गई और कुछ अंतराल में माता-पिता की मृत्यु भी हो जाने के बाद वे परिव्राजक/ सन्यासी हो गए। गांव गांव घूमकर दलितों-पिछड़ों-अल्पसंख्यकों के बीच जाकर उनमें छुआ छूत, अंधविश्वास, ब्राह्मणवाद, दासों के व्यापार, सामाजिक व्यभिचार, महिला शोषण, सामाजिक कुप्रथाओं, रूढ़ियों, देवदासी प्रथा, पशुबलि, शराब, जुए, अज्ञान और ब्राह्मणों के मंदिर निर्माण के रहस्य के विरोध आदि में तार्किक उपदेश दिया करते थे। उनके तार्किक उपदेशों से सामाजिक रुढ़ियां खत्म होने लगी थीं।

उन्होंने शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर सबसे ज्यादा जोर दिया। वे कहते थे “कष्ट उठाकर भी मेरे बहिष्कृत लोग शिक्षा ग्रहण करें। अपने बच्चों को भी अच्छी शिक्षा दिलाएं। सभी लोग ज्ञान प्राप्त करें। इसी से वे अपने मानवोचित अधिकारों की रक्षा कर सकेंगे। अपने मान सम्मान की रक्षा कर सकेंगे। अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में उत्थान कर सकेंगे। अंधविश्वास और अंधश्रद्धा से लड़ने की ताकत भी हमें शिक्षा और ज्ञान से ही प्राप्त हो सकती है।”

शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने क्रांतिकारी कदम उठाते हुए उन्होंने अपना गुरुकुल भी खोल, बाद में शिक्षा के विस्तृत रूप हेतु ‘शारदा मठ ‘ की स्थापना की जिसमे उन्होंने ‘एक दिवस स्कूल’, रात्रि स्कूल, अंग्रेजी सकूल, बौध्दिक स्कूल, पुस्तकालय खोल शिक्षित होने का संदेश दिया “स्कूल ही असली मंदिर हैं, दलित-पिछड़ों के लिये” वे तकनीकी शिक्षा के प्रबल हिमायती थे। दलित- पिछड़ों में भाईचारा बनाने पर जोर देते थे।

गांधी जी ने नारायण गुरु जी से 12 मार्च 1925 को मुलाकात की जिसमे उन्होंने गाँधीजी के जाति व्यवस्था के समर्थक होने का विरोध किया।

श्रीलंका के दौरे के पश्चात वे भगवान बुद्ध की उपदेशों,अत्त दीपो भव,अत्त नाथो भव (अपना दीपक आप बनो, अपना स्वामी आप बनो) उनके शून्यवाद के दर्शन से बहुत ही प्रभावित हुए।

नारायण गुरु जी ने क्रांतिकारी, मानवतावादी, आध्यात्मिक पुस्तक लिखी जिसमे “दि वर्ड ऑफ गुरु” में अभी 45 महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं, और “डायरेक्टरी ऑफ नेशनल बॉयोग्राफी” में 47 महत्वपूर्ण रचनाएं ही उपलब्ध हैं। जिनमे मुख्य हैं – जाति निर्णय, निरवृति, अहिंसा, सदाचार लेकिन उनकी क्रांतिकारी सामाजिक रचनाएं गायब हैं, इसके पीछे किसी सुनियोजित ब्राह्मणवादी षड्यंत्र से इंकार नहीं किया जा सकता ।

फरवरी 1928 को वे गंभीर रूप से बीमार हों हुए थे। काफी इलाज के बाद भी वे ठीक नही हो पाए और कमजोर होते गए। 20 सितंबर, 1928 को 72 वर्ष की आयु में उनका परिनिर्वाण हो गया।

राजेश कुमार बौद्ध,
गोरखपुर उत्तर प्रदेश।

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