मूकनायक
ओमप्रकाश वर्मा
राजस्थान/कोटा
खोजता है दिन-रात एक हसीन आशियाना,
भूल गया उन दिनों के सपनों के अरमानों को।
मद के आगे अपनों ने रिश्तों को बलि चढ़ाया,
साथ छोड़ते अपनों का ना साथ देता साया।
द्वेष भाव ने स्थान लिया, ना प्रेम न विश्वास रहा,
लड़कर क्यों बेटा तुमने ही रिश्तों को गवाया।
क्या क्या प्रण लिए थे तूने बेरोजगारी के दिनों में?
अपनी बिसात को भूल गया कौड़ी के वेतन में।
दो वक्त की रोटी नहीं है जन्म दात्री के चरणों में,
कैसे न्याय करेगा तू अपने ही दिए कथनों में।
संघसाथियों की संग को खीर समझ के पी गया,
आधुनिकता के नाम पर संस्कारों को बेच गया।
बीवी बच्चे ऐसे घूमे हया चली गई पाताल में,
आंखें सबकी झुक गई देख दुल्हन की चाल में।
बाबू बन गया सूट-बूट में फटा पजामा भूल गया,
सांसे रुक गई बापू की बूढ़ा कह के बोल गया।
गली मोहल्ले भद्दे लगते रिश्ते ढूंढे अमीरों में,
इतना कैसे बदल गया रे जात ढूंढता गरीबों में।
कैसे समझाऊं रे तुझे परिवारी संस्कारों को,
भुला नहीं जाता कभी भी अपने रिश्तेदारों को।
लेखक.आशाराम मीणा
उप प्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक, कोटा, राजस्थान।

