मूकनायक
ओमप्रकाश वर्मा
राजस्थान /हिंडौन सिटी
शिकायत कहूँ, शिकवा कहूँ, खुद का दुखड़ा कहूँ।
तारे गिन गिन सिमट चुके हैं, अभी न देखा मुखड़ा।
पलक झपकी न नयन, न सोई मन की आशा।
प्रियतम प्रीत ऐतबार में, आशंकित न निराशा।
खिल रही हूँ पंखुड़ियों में, फूलों सी अभिलाषा।
कली समझ भंवरा मंडराता, बतलाए प्रेम की भाषा।
अदर कपोल में सिसकती, अंगुलियाँ लगें पेहरा।
गुदगुदी चलती आंचल में, सुध बुध खोता चेहरा।
कपकपी सी लगे बदन में, हुस्न में हुआ अंधेरा।
प्रिय मिलन की आस में, जग हंसे हुआ सवेरा।
भंवरे की बौखलाहट में, नींद आंखों से चली गई।
मूर्छित पंखुड़ियाँ फूलों की, कोरक छवि धूमिल गई।
लेखक:
आशाराम मीणा
उप-प्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक
कोटा, राजस्थान

