*कुमारी प्रियंका गर्रूवाल*
हिंडौन सिटी/करौली राजस्थान
किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि हम हमारी शक्तियों को पहचाने और सही प्रकार से कार्य में उन्हें लगाएं। हम एक छोटा सा उदाहरण लेते हैं – मान लो किसी व्यक्ति का कोई लक्ष्य है और वह व्यक्ति उस लक्ष्य की पूर्ति के लिए ठान लेता है, मगर एक अकेला व्यक्ति क्या काफी है उसके लक्ष्य की पूर्ति के लिए? भले ही वह लक्ष्य उसका व्यक्तिगत लक्ष्य हो, मगर यह जरूरी नहीं है कि उसके पास उपलब्ध स्रोत उसके लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पर्याप्त हों। लक्ष्य को प्राप्त करने की इस प्रक्रिया में कभी-कभी उसे किसी की राय की भी आवश्यकता पड़ सकती है, उसकी कोई वित्तीय जरूरत भी हो सकती है या किसी अन्य प्रकार के साधनों की भी जरूरत पड़ सकती है। कहने का तात्पर्य है कि लक्ष्य कोई शब्द या कल्पना मात्र नहीं है, यह जब मूर्त रूप लेता है तो कई प्रकार के तत्वों की आवश्यकता पड़ती है, और जब ये तत्व संगठित रूप से काम करते हैं तो ये शक्तियाँ बन जाती हैं। वो इसलिए क्योंकि शक्ति परिणाम उत्पन्न करती है। तो जब एक व्यक्ति के लक्ष्य के लिए इतने तत्व मिलकर काम करते हैं, तो बात अगर देश और समाज के हित में ली गई किसी लक्ष्य की है, तो हमारा संगठित रूप से प्रयास करना अनिवार्य हो जाता है। कोई भी देश अपने नागरिकों से मिलकर बनता है और खुशहाल देश समझदार और जिम्मेदार नागरिकों से बनता है। और देश का हर नागरिक उसकी एक शक्ति है। जरूरत है जिम्मेदारी को पहचानने की, देश के लक्ष्य को अपना व्यक्तिगत लक्ष्य समझने की, इस बात को समझने की कि वह किस हद तक अपना योगदान देश के विकास में दे सकता है।
यदि कोई व्यक्ति किसी शक्तिशाली पद पर बैठा है तो उसे यह चिंतन करने की आवश्यकता है कि वह उस पद के साथ न्याय तो कर रहा है ना, उसे जो कर्तव्य सौंपे गए हैं, वह उनका पूर्णतया पालन कर रहा है ना। बात केवल पदासीन व्यक्ति की ही नहीं है, आम नागरिक की भी बहुत सारी जिम्मेदारियाँ हैं जिनका निर्वाह कर वह सामाजिक विकास और देश के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। एक परिवार में हर व्यक्ति की कोई न कोई भूमिका होती है, तब ही परिवार आगे बढ़ पाता है, उसी प्रकार हमें जरूरत है इस समाज को देश को अपना परिवार समझने की, जहां कमजोर सदस्यों को सहयोग देकर आगे बढ़ना होता है, और कमजोर वर्ग का भी यह कर्तव्य बनता है कि वह सहयोग प्राप्त कर खुद में सकारात्मक परिवर्तन लाए और सहयोग की इस प्रक्रिया का खुद भी हिस्सा बने। परिवार के सदस्यों के बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव या असंतुलन उस परिवार को आगे नहीं बढ़ने दे सकता। बिल्कुल उसी प्रकार जैसे अगर हमारे किसी एक पैर में चोट लग जाती है तो हमारी चाल विकृत हो जाती है, उसी प्रकार समाज का कोई भी वर्ग, कोई भी व्यक्ति अगर अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं करता है या कोई कमजोर वर्ग बिना सहयोग के पीछे रह जाता है, तो वह समाज भी विकृत हो जाता है। समाज को सुदृढ़ रखने के लिए समाज के हर व्यक्ति, हर वर्ग का कदम से कदम मिलाकर चलना अत्यंत आवश्यक है। एक सुदृढ़, संगठित और खुशहाल समाज ही खुशहाल देश की नींव होता है।
*कुमारी प्रियंका गर्रूवाल*
कांटेक्ट 7976170924

