✍ राजेश कुमार बौद्ध,
बिहार में जाति जनगणना पुनः कोर्ट के आदेश पर शुरू हो रही है, बिहार में जातीय गणना (सर्वेक्षण) जारी रहेगी। पटना उच्च न्यायालय ने मंगलवार को जनगणना से रोक हटाते हुए राज्य में जाति आधारित जनगणना की वैधता को चुनौती देने वाली सभी छ रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की पीठ ने कहा कि राज्य सरकार योजनाएं तैयार करने के लिए सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति को ध्यान में रखकर गणना करा सकती हैं। गणना करने से भविष्य में सरकारी योजना का लाभ देना आसान होगा।
आम लोगों में चर्चा है कि इस बार के इस जाति जनगणना में बहुजनों के लिए इस भारतीय समाज में पूर्व की भातिं पूरी तरह मान-सम्मान स्थापित करने के दृष्टिकोण से बिहार सरकार ने धर्म कोड 05 के साथ-साथ कई सहूलियतें दे रखी है, ऐसी स्थिति में बिहार के सभी 85% मूलनिवासी को इसका लाभ ले लेना चाहिए। क्योंकि सैंकड़ों वर्ष बाद बिहार के बहुजनों को ऐसा मौका मिला है जिसे खोना नहीं चाहिए।
सबको पता है कि हर तरह के भेद-भाव को मिटाने व पूरे देश में हर स्तर पर समानता लाने हेतु बना भारतीय संविधान को आज भी अधिकांश सवर्ण समाज के लोगों द्वारा ठेंगा दिखाया जाता है। यही कारण है कि इस भारत देश में आज भी समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग, लगभग 85% से भी अधिक भारतीय मूलनिवासी (SC/ST/OBC) को समाज में आज भी पूरी तरह बराबरी का दर्जा हासिल नहीं है। जिस कारण सम्पूर्ण भारत में इन बहुजन समाज के बीच एक अलग बेचैनी है।अब तो सामान्य विवेकशील व्यक्ति भी इस बात की समझ रखता है कि बिना सम्मान के किसी तरह का सामाजिक परिवर्तन अर्थहीन है।
भारतीय 85% मूलनिवासी समाज (SC/ST/OBC) का कोई व्यक्ति खूब शिक्षित होकर बिजिनेसमैन, प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजीनियर, मजिस्ट्रेट, वक़ील, जज, विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री, गवर्नर, राष्ट्रपति आदि कुछ भी होते हुए समृद्ध हो जाए, परन्तु सामाजिक स्तर पर उसे सवर्णों के बराबर समानता का दर्जा आज भी हासिल नहीं है, अगर वो अपने को हिन्दू धर्म में स्थापित किये हुए है। यही कारण है कि इतने शिक्षित व समृद्धि को प्राप्त करने के उपरांत भी ये लोग अपनी शादी के लिए सामाजिक स्तर पर सवर्णों के बीच आज भी जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते,और ना ही सवर्णों द्वारा कोई पहल की जाती है।
कहीं-कहीं ये अपवाद देखने को मिलता है कि सवर्ण-अवर्ण के बच्चे चुपके से भागकर शादी तो कर लेते हैं, लेकिन सवर्ण समाज के लोग इसे सामाजिक मान्यता नहीं देते। यहां तक कि सवर्ण समाज के वह परिवार भी उस लड़का/लड़की को अपने सवर्ण परिवार के सदस्य का मान्यता नहीं देते। और उसे जीवन भर इस दंश को झेलना पड़ता है।
ऐसी स्थिति में भी ये शिक्षित और समृद्ध बहुजन अपमानजनक नीचता के दंश से बच नहीं पाते। क्योंकि सवर्ण समाज इन्हें तब भी अपने से नीच ही मानते हैं।
अपवाद को छोड़ बहुजन समाज को विकसित करने या माहौल देने में आज भी ज्यादातर सवर्ण समाज आनाकानी ही नहीं करते बल्कि प्रतिकूल परिस्थिति पैदा करते है। जबकि ये हज़ारों वर्षों से इन्हें क्षुद्रता का जीवन देते तथा इन्हें अशिक्षित रख खुद हमेशा शिक्षित रहते हुए सारा लाभ लिए। ऐसी स्थिति में इनकी ज्यादा जिम्मेदारी बनती है कि ये बहुजनों के विकास व सम्मान में हमेशा प्रोत्साहित करें, माहौल दें और मदद करें।लेकिन भारतीय संविधान के होते हुए भी सामाजिक स्तर पर इनके इन नीतियों में आज भी कोई बदलाव नहीं है और ना ही कोई संभावना है। फलस्वरूप बहुजन समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी किसी तरह दो जून की रोटी जुटा पाता है एवं जहां तक सम्मान की बात है, तो समाज में आज भी वही हजारों साल पुरानी स्थिति है, चाहे गरीब हो या अमीर।
इस सम्बंध में एक और महत्वपूर्ण बात यह कि रास्ते में बातचीत के दौरान अगर कोई अपरिचित व्यक्ति नाम पूछ दे तो बहुजन समाज के ज्यादातर वैसे व्यक्ति अपना जाति छुपाकर ही नाम बताते है, क्योकि उन्हें नीचता के एहसास से डर लगता है। तो भाई डर कैसा और क्यों ?
और फिर शिक्षित होने और अमीर बनने का क्या अर्थ रह जाता है, जब सामाजिक स्तर पर आप वही चुहिया के चुहिया ही हैं ? ऐसी स्थिति में भारतीय संविधान के होते हुए भी धर्म और गुलामी एक साथ नहीं चल सकते। इसे समझना होगा। क्योंकि अब सामान्य विवेकशील व्यक्ति को भी पता है कि हिन्दू धर्म चलता है धर्मशास्त्र से, जिसमें सवाल करना अनैतिक है।
लेकिन बाबा साहब डॉ अम्बेडकर जी ने कहा है कि बौद्ध धम्म बुद्ध के नैतिकताओं का मापदंड एवं ज्ञान व विज्ञान से चलता है, जहां हर स्तर पर लोग समानता, भाईचारा, बन्धुत्व, न्याय के साथ चलते हैं। यहां पर आप सवाल भी पूछ सकते हैं, जिसमें मनुष्य के सुविधाओं के अनुरूप समय पर सम्यक आवश्यक सुधार होते रहते हैं। इसमें ईश्वर और देवी देवताओं का कोई स्थान नहीं है इसमें सभी बराबर हैं, सबमें भाई चारा हैं। यहां नकली लोगों से यह अपेक्षा नहीं कि जाती।
दूसरी तरफ सरकार ने इस जातिये जनगणना में बौद्ध धम्म के लिए 05 कोड के साथ जगह दी है।क्योंकि यह भी मानती है कि बौद्ध धम्म हिन्दू धर्म का अंग नहीं बल्कि यह बौद्ध धम्म स्वतन्त्र है। जिसमें लोग स्वेक्षानुसार अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं। साथ ही जो व्यक्ति बौद्ध धर्म के साथ सरकारी लाभ बनाए रखना चाहते है वह जातिये कॉलम में अपनी जातिये कोड भी दर्ज कर सकते हैं।
क्योंकि आरक्षण का सरकारी लाभ जाति के आधार पर मिलती है। नकि धर्म के आधार पर। परंतु भारतीय बहुजनों को सम्मान का अधिकार तो केवल धर्म के आधार पर ही मिलता हैं।
कोई सवर्ण किसी बहुजन से जाति पूछता है,और वह बहुजन जाति की वजाय अपने को बौद्धिष्ट (क्योंकि बुद्धिज़्म में कोई जातियां नहीं होती) बोलता है तो वह सवर्ण आसानी से उस व्यक्ति को सम्मान के साथ बराबरी का दर्जा दे देता है। इन सवर्णों को अपने धर्म वाले जाति से नफरत है, पर दूसरे धर्म के लोगों से नहीं। यही कारण है कि ये लोग मुस्लिम परिवार में हुए शादी को आसानी से स्वीकार कर लते हैं, परन्तु अपने धर्म के किसी नीच जाति वाले परिवार में हुए शादी को नहीं !
एक बात और महत्वपूर्ण है कि भारत में 85% बहुजनों के साथ जो भी अत्याचार होते हैं, उसमें सबसे ज्यादा अत्याचार अपने ही धर्म के सवर्णों द्वारा किये जाते हैं। इसके पीछे के कारणों के सम्बंध में बाबा साहब डॉ.भीमराव अम्बेडकर जी ने बहुत पहले कहा था कि :-
सवर्णों को पता है कि इन लोगों को बचाने इनके अपने कहे जाने वाले कोई बहुजन भी नहीं आएगा। क्योकि इन लोगों द्वारा ये 85% लोगों को ढेर सारी जातियों में इस तरह बांटा जा चुका है कि ये हमेशा एक-दूसरे का विरोध करते रहें। परिणामस्वरूप जातियों में ज्यादातर लोग हर स्तर से कमजोड़ हैं। शिक्षित होने के साथ ही साथ बहुत मतलबी हो चुके हैं।
सवर्णों को यह भी पता है कि इन बहुजनों को बचाने शेष बचे कोई भी अन्य धर्म वाले लोग भी कभी नहीं आएंगे। क्योंकि धर्म के आधार पर जो लड़ाई लगाई जाती है उस लड़ाई में ये कमजोड़ होते हैं। अशिक्षित बहुजनों को ही आगे रखा जाता है। फलतः अन्य धर्म वालों के लिए ये आसानी से नफरत का पात्र बन जाते हैं। और इस प्रकार अकेले हो जाने के कारण अपने ऊपर होने वाले अत्याचार का ये खुल कर विरोध भी नहीं कर पाते और ना ही कहीं से इन्हें मदद मिलती है। अन्य धर्म वाले तो और खुश होते है।
ऐसी स्थिति में स्पष्ट है कि अगर व्यक्ति को खूब शिक्षित हो व समृद्धि को प्राप्त करते हुए साथ में सम्मान सहित जीवन चाहिए तो इन भारतीय 85% मूलनिवासी (SC/ST/OBC) को बिहार के इस जाति जनगणना 2023 में बौद्ध धम्म का कोड 05 दर्ज करना चाहिए की नहीं ?
वैसे भी इतिहास गवाह है कि ये सभी मूलनिवासी बहुजन इसके पूर्व बौद्ध ही थे, जिसके कारण इतनी परेशानियों के बावजूद भी ये नैतिकता का दामन नहीं छोड़ते। और आज भी भारत में भारतीय बौद्ध देश के नाम पर खूब अच्छी-खासी अंतरराष्ट्रीय मदद मिलती है। जिसका ज्यादातर लाभ भी सवर्ण समाज के लोग ले लेते हैं।
यहां एक बात और आवश्यक है कि भारतीय 85% मूलनिवासीयों के हितैषी सभी बहुजन संगठनों व चिंतकों को चाहिए कि वे बिहार के अपने फ़ॉलोअर्स व अपने नाते-रिस्तेदारों को बाबा साहब डॉ अम्बेडकर जी के इन विचारों व आम बहुजनों के हित सम्बंधित इन बातों से जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी अवगत करा देनी चाहिए ताकि सभी को निर्णय लेने में आसानी हो।
साथ ही यहाँ बहुजन समाज के राजनेताओं को भी चाहिए कि व्यक्तिगत राजनैतिक लाभ से ऊपर उठ सामाजिक हित में निर्णय लिया करें। क्योंकि इसमें इनके भी परिवार प्रभावित होते हैं। इनकी समाज मे काफी फजीहत होती है, सच्चाई यही है।
उक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि 85% भारतीय मूलनिवासीओं के लिए यह अति महत्वपूर्ण व विचारणीय प्रश्न है ! जिस पर उचित निर्णय लेते हुए धर्म कोड 05 भरी जानी चाहिए।और इससे औरों को भी अवगत कराया जाना चाहिए।
साधुवाद
राजेश कुमार बौद्ध
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश। Email- prabuddhvimarshgkp@gmail.com

