Thursday, February 26, 2026
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” ओमप्रकाश वाल्मीकि: हिंदी साहित्य में एक ज्वालमुखी “

✍ राजेश कुमार बौद्ध

सामाजिक पीड़ाएं जब दबती है तो आंसू व सिसकियों में तब्दील हो जाती हैं, यहीं पीड़ाएं जब उभरती है तो जन आन्दोलन का रूप धारण करती है। और जब यही पीड़ाएं शब्दों का रूप लेती है तो साहित्य बन जाती हैं, और ” जूठन ” जैसी कालजयी रचना का जन्म होता हैं। ऐसे ही एक शख्सियत ” ओमप्रकाश वाल्मीकि जी ” जिन्होंने अपनी सामाजिक पीड़ाओ को शब्दों में उकेर कर तत्कालीन मानसिक बिमार समाज की तस्वीर को अपने रचनाओं के जरिए देश-विदेश के लोगों के मानस पटल पर रखा और उसे झकझोरने का काम किया।

उनकी आत्मकथा “जूठन ” में किस तरह लंबे समय से भारतीय समाजिक व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर खड़ी ” स्वच्छकार जाति ” को सवर्णों से मिली चोट कचोट के बीच परिस्थितियों से संधर्ष करता हुआ दलित आन्दोलन का या दलित चेतना का दहकता हुआ दस्तावेज है।

यहाॅ आपके सामने जूठन का भुक्त भोगी दलित लेखक एवं वरिष्ठ साहित्यकार ओम प्रकाश वाल्मीकि जी का कथन प्रस्तुत कर रहे हैं- वाल्मीकि जी का जन्म 30 जून 1950 बरला, जिला मुजफफरनगर, उत्तर प्रदेश, हुआ। शिक्षा- एम.ए. हिन्दी साहित्य और मैकेनिकल क्षेत्र के थे। वाल्मीकि जी की यह कथा अंग्रेजी, जर्मन, स्वीडिश, पंजाबी, तमिल, मलयालम, कन्नड़, तेलगू में अनूदित एवं प्रकाशित हो चुकी हैं। इतनी ख्याति पाने के बाद भी वाल्मीकि जी को अपनी सरकारी सेवा में जाति के नाम पर हमेशा ढेर सारे कडुवे अनुभव हुए।

वाल्मीकि जी ने 1985 में चन्द्रपुर महाराष्ट, भारत सरकार की ऑर्डनेंस फैक्टरी में कार्य भार संभाला, महाराष्ट में जातिभेद उतना नहीं है, जितना उत्तर भारत में था। इसीलिए चन्द्रपुर में वाल्मीकि जी का रहते हुए अच्छा जीवन गुजरा। फिर चन्द्रपुर पिछड़ा क्षेत्र भी है। लेकिन सेवा निवृति से ठीक एक या दो वर्ष पहले उनका टांसफर देहरादून हो गया। इस कुछ ही महीनों के बाद वाल्मीकि जी 17 नवम्बर 2013 को उनका निर्वाण हो गया।

वाल्मीकि जी को देहरादून आने पर ही जातिभेद का अनुभव हुआ जहाॅ उन्हें जातिभेद के कारण रहने को मकान नहीं मिला। सभी जगह मकान मालिक जब पूछताछ करते तो पहला सवाल जाति का ही पूछते थे। आपका सरनेम क्या है? देखो जी, बाद में झंझट नहीं चाहिए, हम लोग कुमाउॅनी ब्राहमण हैं, किसी डोम या मुसलमान को अपने यहाॅ किराये पर नहीं रख सकते। तो किसी ने कहा ना जी, किसी चूहड़े, चमार को हम मकान नहीं देंगे। वाल्मीकि जी लिखते हैं यदि आधुनिक कहे जाने वाले पढ़े लिखे लोगों के इस शहर देहरादून की यह हालत है तो छोटे शहरों में तो दलितों को मकान मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता हैं।

सफाई देवता – भारतीय समाज में अस्पृश्यता की इन धारणाओं के चलते भंगियों को तकलीफदेह, अपमानजनक स्थितियों से गुजरना पड़ता है। नासिक ( महाराष्ट्र) नगरपालिका की वार्षिक रिपोर्ट 1884- 85 में बताया गया है-” शौचालय रात को ही साफ किए जाते हैं और रातों-रातों मैला डिपो में पहुँचा दिया जाता है। भंगियो के मनहूस हुलिए को देखना भी लोगों को गवारा नहीं है। अतएव मैला -सफाई का काम रात के अंधेरे में ही करवाना पड़ता था। हम तो यह सोचकर ही दंग रह जाते हैं कि सँकरी, तंग, उबड़-खाबड़ गलियों से गुजरते हुए रात के अँधेरे में मैला ढोने वाले उन लोगो पर क्या गुजरती होगी?’

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता संदियों का संताप ही नहीं, उनका सारा साहित्य इस बात की गवाही देती हैं कि वे यातना, संघर्ष और उम्मीद के कवि और लेखक हैं।यातना, संघर्ष और उम्मीद की उनकी यह यात्रा व्यक्तिगत नहीं है, बल्कि उस पूरे समुदाय की है, जिसमें उन्होंने जन्म लिया। जन्म लेते ही जिसकी नियति तय कर दी गई। वे आजीवन उस नियति को बदलने के लिए संघर्ष करते रहे। इसी नियति की ओर इशारा करते हुए वे अपनी आत्मकथा ‘जूठन’ में लिखते हैं कि “ जाति में पैदा होते ही व्यक्ति की नियति तय कर देती है। पैदा होना व्यक्ति के अधिकार में होता, तो मैं भंगी के घर पैदा क्यों होता? ” लेकिन उन्होंने अपनी नियति को बदलने की चुनौती को स्वीकार किया और इस प्रक्रिया में हिंदी साहित्य की नियति अपनी कविताओं, कहानियों, नाटकों और आत्मकथा ‘जूठन’ से बदल दिया।

ओमप्रकाश वाल्मीकि का हिंदी साहित्य में प्रवेश लंबे समय से सुप्त पड़े ज्वालामुखी के फूट पड़ने जैसा था। जिसकी आंच पूरे हिंदी साहित्य ने महसूस की। उन्होंने हिंदी पाठकों को उस जीवन से रू-ब-रू कराया जिससे वह अब तक अनभिज्ञ और अनजान था। इस यथार्थ की अभिव्यक्ति की दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। पहली जो पाठक यथार्थ के इस रूप से अपरिचित थे, उन्हें यह बिजली के झटके की तरह लगा। दूसरा जो पाठक इस यथार्थ की यातना को जी रहे थे, उन्हें अपनी भावना- संवेदना की अभिव्यक्ति लगी। प्रचलित परिपाटी के अभ्यस्त हिंदी साहित्य को ओमप्रकाश वाल्मीकि के साहित्य को स्वीकार करने में काफी देर लगी। स्वीकृति के बाद भी सारिका ने 10 वर्षों तक उनकी कहानी ‘जंगल की रानी’ को लटकाए रखा। अपनी आत्मकथा जूठन के पहले भाग में इस पूरे प्रसंग पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि “साहित्य के बीच भी एक सत्ता है, जो अंकुरित होते पौधों के कुचल देती है।” पहली बार राजेन्द्र यादव ने हंस में उनकी कहानियां प्रकाशित करना शुरू किया। जब एक बार ओमप्रकाश वाल्मीकि पाठकों के सामने अपनी रचनाओं के साथ आए तो पाठकों ने उन्हें हाथों – हाथ लिया।

उनकी आत्मकथा जूठन की लोकप्रियता का आलम यह है कि 1997 में पहली बार प्रकाशित होने के बाद उसके पहले खंड के अब तक तेरह संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। दूसरा खंड 2015 में प्रकाशित हुआ। उसके भी चार संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी आत्मकथा का देश- दुनिया की कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। सच यह है कि ओमप्रकाश वाल्मीकि की दो खंडों में प्रकाशित आत्मकथा ‘जूठन’ दलितों में भी दलित जाति में पैदा होने की यातना और उससे उबरने के संघर्ष का सुलगता दस्तावेज है। यह एक व्यक्ति की आपबीती होते हुए भी एक पूरे-के-पूरे समुदाय की आपबीती कहानी का जीता-जागता दस्तावेज बन जाता है। आप जो भी इस आत्मकथा से गुजरता है, उसे महसूस होता है कि जैसे वह धधकते ज्वालामुखी में कूद पड़ा हो। यह आत्मकथा भारतीय समाज के उन सारे आवरणों को तार-तार कर दिया, जिनकी ओट में सच्चाई छिपाई जाती थी और महान भारतीय संस्कृति का गुणगान किया जाता था। ‘जूठन’ ने हिंदी के वर्ण- जातिवादी प्रगतिशीलों और गैर-प्रगतिशीलों, दोनों के सामने एक ऐसा आईना प्रस्तुत कर दिया, जिसमें वे अपना विद्रूप चेहरा देख सकते थे। यथार्थ के नाम पर हिंदी साहित्य में परोसे जा रहे बहुत-से झूठ को भी यह आत्मकथा बेनकाब करती है और बताती है कि भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से के जीवन- यथार्थ का न तो हिंदी के द्विज साहित्यकारों को बोध है, न उसकी अभिव्यक्ति वे कर सकते हैं। इस आत्मकथा की पहली पंक्ति ही इन शब्दों से शुरू होती है- “दलित-जीवन की पीड़ाएं असहनीय और अनुभव-दग्ध हैं। ऐसे अनुभव, जो साहित्यिक अभिव्यक्तियों में स्थान नहीं पा सके। ऐसी समाजिक- व्यवस्था में हमने सांस ली है, जो बेहद क्रूर और अमानवीय है।” (वही, पृ.-7)

उनके तीन कहानी संग्रहों ‘सलाम’, ‘घुसपैठिए’ और ‘सफाई देवता’ कहानियों पाठकों-आलोचकों के सामने एक ऐसी दुनिया प्रस्तुत की, जिससे वे अब तक अनजान थे। इसमें कोई शक नहीं है कि इस दुनिया का यथार्थ विचलित कर देने वाला और झकझोर देने वाला था। उनकी कहानियों की अंतर्वस्तु और अभिव्यक्ति शैली, सच को इस तरह सामने लाती हैं कि पाठक का पूरा वजदू हिल उठता है। वह इस सच को सच मानने को तैयार नहीं हो पाता और इसे झूठ मानकर खारिज भी नहीं कर पाता। वह बेचैन और उद्विग हो उठता है।

वाल्मीकि जी की कविताएं पाठकों को एक साथ कबीर और रैदास दोनों की याद दिलाती हैं। उसमें बहुत कुछ ऐसा जो बिल्कुल ज्वालामुखी के ताजे लावे की तरह है। आंच एवं ताप भरा। उनका पहला कविता संग्रह ‘सदियों का संताप’ एक दहकता लावा है। दलित समाज के हजारों वर्षों की पीड़ा को अपने भीतर समेटे वे कभी चैन से जी नहीं पाते हैं, सुकून की सांस नहीं ले पाते हैं-

जब भी मैंने
किसी घने वृक्ष की छाँव में बैठकर
घड़ी भर सुस्‍ता लेना चाहा
मेरे कानों में
भयानक चीत्‍कारें गूँजने लगी
जैसे हर एक टहनी पर
लटकी हो लाखों लाशें
ज़मीन पर पड़ा हो शंबूक का कटा सिर ।
मैं उठकर भागना चाहता हूँ
शंबूक का सिर मेरा रास्‍ता रोक लेता है

ओमप्रकाश वाल्मीकि अपनी और अपने समाज की यातना को सहते हुए भी किसी समुदाय विशेष या व्यक्ति विशेष से बदला नहीं लेना चाहते। उनका संघर्ष उस व्यवस्था और उन विचारों से है, जो इंसान-इंसान के बीच समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व आधारित संबंधों को बनने नहीं देती। वे अपने सारे दुख, आक्रोश और यातना को समेटकर एक न्याय और समता आधारित दुनिया का स्वप्न देखते हैं-

इसीलिए, हमने अपनी समूची घृणा को
पारदर्शी पत्‍तों में लपेटकर
ठूँठे वृक्ष की नंगी टहनियों पर
टाँग दिया है
ताकि आने वाले समय में
ताज़े लहू से महकती सड़कों पर
नंगे पाँव दौड़ते
सख़्त चेहरों वाले साँवले बच्‍चे
देख सकें
कर सकें प्‍यार
दुश्‍मनों के बच्‍चों से
अतीत की गहनतम पीड़ा को भूलकर

जूठन दलित-जीवन की पीड़ाएं असहनीय और अनुभव-दग्ध हैं। ऐसे अनुभव जो साहित्यिक अभिव्यक्तियों में स्थान नहीं पा सके। एक ऐसी समाज-व्यवस्था में हमने सॉसें ली है, जो बेहद क्रूर और अमानवीय है। दलितों के प्रति असंवेदनशील भी…..। इसी समाज की क्रूरताओं का परिचय एक नए कोण से हमें इस आत्माकथा में मिलता है।

ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की प्रसिद्ध कविता संग्रह मे- ठाकुर का कुआँ, सदियों का संताप, बस्स! बहुत हो चुका, अब और नहीं, शब्द झूँठ नहीं बोलते ।

कहानी संग्रह – सलाम, धुस पैठिए, छतरी, अम्मा एन्ड अदर स्टोरीज़, ।

आलोचना- सफाई का देवता, मुख्यधारा और दलित साहित्य, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र।

नाटक – लगभग 60 नाटकों में अभिनय एवं निर्देशन, दो चेहरे, उसे वीरचक्र मिला था।

ओमप्रकाश वाल्मीकि जी ध्दारा लिखी गई उनकी आत्मकथा ” जूठन ” पंजाबी, मलयालम, तमिल, कन्नड़, अंग्रेजी, जर्मनी, स्वीडिश भाषा में अनूदित में उन्होंने दलित वर्ग पर सवर्णों ध्दारा जातीय भेदभाव,शोषण वीभत्स उत्पीड़न से उत्पन्न समस्याओं पर ध्यान आकृष्ट किया है। जिसके लिए उन्हें 1993 में ” डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ ही अन्य महत्वपूर्ण सम्मान जैसे ” परिवेश सम्मान ” 8 वां विश्व हिन्दी सम्मेलन न्यूयॉर्क, अमेरिका सम्मान, साहित्य भूषण पुरस्कार, न्यू इंडिया बुक पुरस्कार, कथा क्रम सम्मान आदि देश – विदेशों में अलंकृत किया गया था।

लेखक
राजेश कुमार बौद्ध
गोरखनाथ, जिला-गोरखपुर, (उत्तर प्रदेश) Mob.N.9616129934, Email- prabuddhvimarshgkp@gmail.com

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